काव्यांजलि
Wednesday, July 5, 2023
आमंत्रण(कविता)
बादलों से झरता अमृत
मेघ मल्हार गाती
शीतल पवन,
गुमसुम सी नदी
लिए बैठी है
सृजन का थाल।
अधर बांच रहे है
अनकहा
नयन गढ़ रहे है
नवीन परिभाषा।
सांसों का संगीत
दे रहा है मौन आमंत्रण
कि कोई आए और
लिख जाए नवगीत
पुनः मिलन का।
डा अनिल
No comments:
Post a Comment
Newer Post
Older Post
Home
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
No comments:
Post a Comment