Wednesday, August 2, 2023

कविता( संवेदना की अलगनी)

संवेदन हीनता की अलगनी पर
     टांगते हुए रिश्तों ने 
    खोखली हुई अपनेपन की
   चिटखनी से ,अनायास ही 
फेंक दिया एक प्रश्न,
बंजर होती भावनाए
 मर क्यों गयी ।
अर्थ की चादर 
इतनी महान
कैसे होगई
चरमराते टूटे नेह के 
दरवाज़े से आवाज़ आई
जब जब स्वार्थ
रिश्तों को लीलता रहेगा
हम अपनेपन के धागों को
कमजोर करते रहेंगे
और लगा देंगे गला हुआ
बेबुनियाद थेकला
जो नही होने देगा कभी 
संबंधों की तुरपाई को 
ताकतवर।।।।।।

डॉ अनिल जैन उपहार

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