Monday, August 28, 2023

रक्षा बंधन (कविता)

हर बार तुमने 
मेरी सूनी कलाई पर 
अपने स्नेह के हस्ताक्षर कर 
अपनी दुआओ के तमाम दस्तावेज
मेरे नाम कर दिए ।
और मैंने भी रवायतो के खाली 
प्रष्ठ पर अपनी जेब के कुछ पल 
तुम्हारी हथेली पर रख 
अपने फ़र्ज़ की इति श्री कर ली ।
क्या सही अर्थों में 
निभा पाया हूँ मै तुम्हारे स्नेह के 
मुल्य कों ?
आज के इस पवित्र दिन 
मेरे हाथों में बंधे इस धागे की कसम 
मेरा वचन है तुम्को 
की अब कोई बहन अपने भाई से 
नही मांगेगी रक्षा का वचन ।
हर भाई ठीक मेरी ही तरह 
निभाएगा हर वो फ़र्ज़ 
जिस पर सिर्फ बस सिर्फ बहन 
तुम्हारा ही हक होगा ।
और दूर चौराहों पर तुम कर सकोगी 
बेखोफ विचरण 
हजारो की भीड़ में और हर वक़्त 
खड़ा पाओगी किसी भाई को अपने 
साथ ।

-----------अनिल उपहार --------

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