मेरे देश का अन्नदाता
भूखा रहके भी सबुरी से काम लेता है ।
ओढ़कर बेबसी ज़िल्लत के जाम लेता है ।
रहन है जिसकी जवानी बुढापा कर्जे में
हँस के पुरखों की विरासत वो थाम लेता है ।
अनिल जैन उपहार
No comments:
Post a Comment