अज़ीब भटकाव है न
रिश्तों के दरमियाँ
बुलंदी हमे अहसास
नहीं होने देती
किसी को अपना बना लेना
या किसी का बन कर रह जाना।
शोहरत का हिमाला
ओर कामयाबी की मीनारे,
ऊँचा तो उठाती है
पर कहीं हमे इंसानी
जज़्बातों से गिरा न दे
जरूरत है तो बस
संबंधों के भव्यमहल पर
अपनेपन की आधारशिला
रखने की ।
तभी सार्थक होगा
तुम में मै ओर
मुझमे तेरे होने का
जीवंत अहसास
जो दूर कर पाएगा
मन के एकाकीपन
की खाई को ।
अनिल जैन उपहार
No comments:
Post a Comment