Saturday, October 28, 2017

एकाकीपन (कविता)

अनंत संवेदनाओ से भरे
एकाकीपन के बादल
आंखों के पोर की
गहराई नाप लेने को
है आतुर ।
समर्पण की त्रासदी को झेल
बेकसूर आदमी के
हलफनामे की तरह
अति विश्वास की तहरीर
बांच लेना चाहते है
पथराये नयन ,
न्यायाधीश बना मन
मानने को तैयार नही
कोई दलील ।
सजा भुगतने को विवश
निर्दोष और निश्छल हृदय
अनचाही कैद में
हो जाना चाहता है कैद ,
फिर से अलगांव की
आग में झुलस
स्मृति के खंडहरों में
गुम हो जाने के लिए ।
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अनिल जैन उपहार

Sunday, October 22, 2017

सम्मोहन

एक अजीब सा सम्मोहन था
उसकी बातों में ,
उसका हर्फ़ हर्फ़
अदबी इतिहास की
गवाही सा प्रतीत  होता
था ।
उसकी लेखनी
छंद बन गीतों में ढल जाया
करती थी ।
संस्कारों की पाठशाला का
कुशल विद्यार्थी था वो ।
अवसाद के बादल
कभी बरस नही पाए थे
उसके आँगन में ।
संवेदना के दो चार छीटें ही
काफ़ी थे उसके
किसी की पीड़ा को
हर लेने के लिए ।
थोती विरदावलियाँ
भाती ही नही थी उसे ।
शायद यही अच्छाइयां
हर बार थोप देती थी
प्रश्न चिन्ह
उसकी कार्यशैली पर ,
ओर वो होजाता था निशब्द
अपनी बेगुनाही के
सबूत जुटाने में ।

अनिल जैन उपहार

Tuesday, October 10, 2017

कविता(दीप माला)

अप्रतिम सौंदर्य और
उदात्त विचारों को
अभिव्यक्त करता
उसका संवाद ।
अनु भव के केनवास पर
कुशलता से उकेर देना
मन के जज़्बात ।
बखूबी आता था उसे
हल कर देना
रिश्तो का गणित
संवेदना की हर इबारत
लिख जाती थी
उसके आने की
अनकही दासता ।
प्रतीक्षा थी तो बस
उसके लौट आने की ।
कोई दीप माला लिये
बैठा है
मन की चौखट पर ।

अनिल उपहार