ये जो तुम्हारे सख्त लहज़े की
तहरीर है न
बड़ा नर्म अहसास
कराती है
पथराई आंखों को ।
शायद इन्ही में गुम तो
नहीं
हौसलो के पर
जो खींच लाये है
तुम्हे धरती से
आसमा पर ।
अनिल जैन उपहार
ये जो तुम्हारे सख्त लहज़े की
तहरीर है न
बड़ा नर्म अहसास
कराती है
पथराई आंखों को ।
शायद इन्ही में गुम तो
नहीं
हौसलो के पर
जो खींच लाये है
तुम्हे धरती से
आसमा पर ।
अनिल जैन उपहार
स्मृति के खंडबिम्ब
और कौंधते शब्द
नित देते
मेरी सर्जना को
संदर्भ ।
ठीक उसी तरह
सावन की पहली बून्द ने
लिख दिया था
मिलन के पृष्ठ पर
अलसायी सुबह का सच ।
गवाह है वो हस्ताक्षर
जो आज भी दर्ज़ है
सुनहरी यादों के दस्तावेज पर ।
अनिल उपहार
बनके नगमा कोई मीठा सा संवर जाए हम ।
हार कर दिल की हुकूमत और निखर जाए हम ।
दूर तक पसरा जो सन्नाटा आओ कम कर दें
भीगें अहसास की बारिश में बिखर जाए हम ।
अनिल जैन उपहार
अतीत की पगडंडी पर
चलते चलते
खो जाता है मन
दिवास्वप्नों में ।
नेह की बारिश में
भीगता तनमन
अकल्पनीय बंधनो में
जकड़ना
मुठ्ठी में कसकर
पकड़ लेना
आशाओ की बालू
ठीक उसी तरह
जिस तरह तुमने बांधा था
अपने मोहपाश में ।
सुरमई धूप का खिलना
यादों के दरीचों का खुलना
कोई दस्तक तो नही है न ,,
तुम्हारे आगमन की ।
माटी की सौंधी गंध
बता रही है कि-
कोई भीग गया है फिर से
पहली बारिश में
और रख दिया है
सावन अपनी पलकों पर ।।।
अनिल जैन उपहार