विदाई गीत।
संयम के पंछी तोड़ पिंजरा शिवपुर नगरी में
चल दिए सबको छोड़,मोह के बंधन तोड़।
( १ )
मिला चातुर्मास हमको सौभाग्य पिड़ावा का।
संयम से अलंकृत था हर गान पिड़ावा का।
अब रोके से न रुके कदम ये बढ़ते जाते है,
मोक्ष महल की ओर,चल दिए सबको छोड़।
( २ )
आंखों का अश्रु जल गंगा सा बहता है।
हम धीर दरें कैसे मन घुट घुट सहता है।
अब नही किसी से आज,शरण में रखना अपने पास
छूटे ना जीवन की डोर,चल दिए सबको छोड़।
(३)
गर भूल हुई हम से,तो माफ कर देना।
बादल ये उदासी के सब साफ कर देना।
आशीर्वाद का हाथ सदा माथे पे रखना आप
आप ही जीवन की भोर,चल दिए सबको छोड़।
(४)
है चरणों में अर्पित,भावांजलि मेरी।
हर छंद कविता का, आद्रांजली मेरी।
आशीष से बनते और संवरते सारे बिगड़े काज
छोटी सी ये अरदास,मस्तक पे रखना हाथ।
(५)
गुरुदेव आप जैसा,ना हुआ कोई होगा।
बरसों की साधना का,ही पुण्य फला होगा।
कब आओगे गुरुवर,बतादो पिड़ावा नगर की ओर
भीगी है पलकों की कोर,चल दिए सबको छोड़।
,,,,,,,,,,,,,,,,,,