Saturday, November 24, 2018

झालावाड का शानदार कवि सम्मेलन 21/10/18

कोटड़ी का ऐतिहासिक कवि सम्मेलन 10/11/18

पयामे इंसानियत पिड़ावा

कविता(विवशता)

सूरज को चुरा लेने की
साजिश में ,
हर बार छला गया है
मन,
कम होने लगा है
ख्वाबों का वज़न ।
ग़मो का भारी होता पलड़ा
तोलना चाहता है
आंखों की नमी ।
धड़कने बांचने लगी है
माँ के आंचल की कथा ।
काश समझ पाते हम,
इन बरकतों के झरने की
झर झर,
और निकल पाते
मेहंदी की गंध से बाहर
उस बूढ़े बरगद की
छाँव तले
जीवन की पूर्णता को समेटे
सौंधी सी गन्ध लिये
लौट आते गाँव ।।।।।।।

अनिल जैन उपहार