Monday, August 31, 2020

गीत बादलों के गाँव

गीत -----
बादल घिर घिर आए
कोयल कुहू कुहू गाये
सजन तुम क्यो नही आए
विरह की आग जलाए।

ओ परदेसी साजन आजा रे  अब आजा।
तुम बिन सूनी रतियाँ
संदेसा भिजवा जा।
पापी पपीहा रा गाए
सूनी सेज डराए ।
सजन तुम क्यो नही आए
विरह की आग जलाए।

सखिया संग संग झूले
सावन बीता जाए।
याद में तेरी बालम
आँखे भर भर आए।
आ के धीर बंधा जा
मेरी सेज सजा जा ।
सजन तुम क्यो नही आए।
विरह की आग जलाए।

ले चल सजना अबतो
बादल के उस गाँव।
साथ गुजारे पल हमने
पीपल की थी छाँव।

कोई गीत सुना जा
मोसे प्रीत निभाजा
सजन तुम क्यो नही आए
विरह की आग जलाए।

डॉ अनिल जैन उपहार

मुक्तक(सागर)

जज़्बातों के सागर में, होले से कंकर मार गया ।

वो सदियों की प्यास लिये, फिर दरिया के पार गया ।

झील सी गहरी आंखों में ,क्या अज़ब गज़ब गहराई थी

डूबने वाला ऐसे डूबा ,आर गया ना पार गया ।

डॉ अनिल जैन उपहार

Friday, August 28, 2020

पिंजरा (कविता)

विषय ----पिंजरा

हर बार कैद कर दिया गया फ़ज़ीहत के पिंजरे में
कभी आत्म सम्मान की कीमत पर
तो कभी अपने हुनर के दम पर
कब तक देता रहूंगा दलील
तुम्हारी अदालत में 
कभी विवशता की आंधी में गुम हो जाती है
मेरी बेगुनाही
आखिर कब होगी रिहाई
तुम्हारी रूढ़िवादी इन
तकरीरों के सामने
हर बार होता रहा हूँ
बेबस और लाचार।
ये दकियानूसी का पिंजरा
आखिर क्यों नही होने देता रिहा।
तुम समझ रहे हो न
मैं पहले भी तुम्हारे साथ था 
आज भी खड़ा हूँ 
प्रतीक्षा में कि
तुम आओगे और कर दोगे आज़ाद
सारी बंदिशों से ।

डॉ अनिल जैन उपहार

Tuesday, August 25, 2020

गीतिका(वक़्त का कुछ भरोसा नही)

वक्त का कुछ भरोसा नही एक पल में गुज़र जायेगा।
बुलबुला है ये पानी का एक पल में बिखर जायेगा।

चार दिन की ग़मे ज़िन्दगी आओ हँस कर इसे काट ले
तुम करो कोई वादा वफ़ा ये यकीनन संवर जाएगा।

तू ने जो भी किये है करम साथ में बस वोही जाएगा।
दर्द तो बस मुसाफिर है वक्त के साथ टल जाएगा।
मौत का कुछ भरोसा नही एक दिन सब को आनी है।
हँस हँस जो बांधे करम उन का फल भी तू ही पाएगा।

डॉ अनिल जैन उपहार

Monday, August 24, 2020

गीत (निर्झर)

विषय --निर्झर/झरना

नेह निर्झर अब न सूखे सब करें ऐसे जतन।
मन देहरी से विवश लौटे ना कभी प्यासे नयन।

रीत ता ही जारहा संवेदना का अश्रु जल।
लुप्त होने क्यो लगा झरनों का मधुरिम कल कल।
ये उदासी के भंवर कब तक रहेंगे रोक कर।
बाट जोहते थक गए वो प्रीत के  अनछुए पल ।

रिश्तों को लगा डसने अब तो मन का देखो खालीपन।
मन देहरी से विवश लौटे ना कभी प्यासे नयन।

अपनापन भी खो गया सम्बन्ध बौने होगए।
स्वार्थ की आंधी चली अपने पराये हो गए।
प्यार के दो बोल को लो वो तरसते उम्र भर।
सिर्फ खुशियाँ बांटने में जिनको सदियों हो गए।

जख्म ऐसे भी मिले जो झेल ना पाए तपन।
मन देहरी से विवश लौटे ना कभी प्यासे नयन।

डॉ अनिल जैन उपहार

उदासी(कविता)

अगर तुम आओ अपनी हाजरी देने 
तो खामोशियों के दस्तावेज साथ मत लाना।
पैरवी कर रही निगाहों ने
दे दिया है हलफनामा
अपनी गवाही का,
फैसले की प्रतीक्षा 
करना है मिलकर
उदासियों के द्वार की
चाबी 
हो सके तो लेते आना ।

अनिल जैन उपहार

Sunday, August 23, 2020

गीतिका

गाया हर  गीत में तुमको न यूँ अब आहे भरो।
मेरा आधार बनो।
  हमसे रूठा न करो।

मेरी ग़ज़लों के हो उनवान तुम्ही।
मेरे हर छंद कविता के हो उपमान तुम्ही।
तुम्ही महकते रहे मुक्तकों में कहीं।
तुम्ही से यादों की ये सरिता जो बही।
तुम्ही हो मेरी इबादत तुम्ही अरदास वही
हमसे रूठा ना करो ।

बातों में तेरे शहद सी है घुली।
रूप की धूप में यादें है धुली।
तुम्ही से शाम मेरी और ये परछाई तुली
तुम्ही हो रागिनी संग मेरी जो सांसों में घुली
तुम्ही हो ज़िन्दगी का गान और बखान तुम्ही
हमसे रूठा न करो ।

डॉ अनिल जैन उपहार

Saturday, August 22, 2020

मुक्तक

छत पे आते नहीं क्यो परिंदे यहाँ ।
ओढ़े खामोशी बैठे परिंदे यहाँ।
नफरते घुल गयी क्यो फ़िज़ा में यहाँ।
राग मल्हार अब तो ना गाते यहाँ ।

ओढ़नी दर्द से भीग कर पल गईं ।
ज़िन्दगी टूटकर सांचे में ढल गई।
अपनापन तो दिखावे में शामिल रहा
सिसकियां हिचकियों को सभी छल गई।

डॉ अनिल जैन उपहार

Thursday, August 20, 2020

गीत((गीत बन के आइये)

गीत गुनगुना रहा हूँ गीत बन के आइये।
देहरी पे फिर कोई नवगीत छेड़ जाइये।

मुक्तकों से है नयन छंद सजे अधरों पर।
गेसुओं पे सज रही घनाक्षरी भी झूम कर।
लक्षणा अभिधा जैसा रूप ओढ़ आइये
व्यंजना से स्वर मिले वो काफिया सजाइये।

गुरु लघु सा चित्र लिए रेखाए बता रही।
लय और ताल सी गति ह्रदय पटल पे छा रही।
दोहों और चौपाइयां सी तान लेके आइये।
पायलों की वो मधुर झनकार ले के आइये।

आभा स्वर्ण रश्मियों ने जो रखी कपोल पर।
गीतिका सी लग रही दो पाँखुरी अधर पर।
भोएँ अनुबंध लिख रही थी स्वप्न आइये।
नयनों के अनुप्रास पर गीत तो रचाईये ।

डॉ अनिल जैन उपहार

Wednesday, August 19, 2020

गीत(नैया ले चल उस पार

पिया बसे परदेस बलम से कैसे करूँ मनुहार।
नैया ले चल मोहे उस पार।

सावन बीता बिन सजना के सेज सिसकती रातों में।
अलसायी सी रहती हूं खोयी रहती बातों में।
असुवन के जल से धोती हूँ अपना सब श्रृंगार।
नैया ले चल मोहे उस पार।

बारिश की बूंदों से जलती हृदय पटल की फुलवारी।
बिन तुम्हरे सूखी जाती है नेह सिक्त जीवन की क्यारी।
कोयलिया भी लगी चिढ़ाने अब तो बारम्बार।
नैया ले चल मोहे उस पार।

गीत (गीत लेकर आइये)

गीत गुनगुना रहा हूँ गीत बन के आइये।
देहरी पे फिर कोई नवगीत छेड़ जाइये।

मुक्तकों से है नयन छंद सजे अधरों पर।
गेसुओं पे सज रही घनाक्षरी भी झूम कर।
लक्षणा अभिधा जैसा रूप ओढ़ आइये
व्यंजना से स्वर मिले वो काफिया सजाइये।

गुरु लघु सा चित्र लिए रेखाए बता रही।
लय और ताल सी गति ह्रदय पटल पे छा रही।
दोहों और चौपाइयां सी तान लेके आइये।
पायलों की वो मधुर झनकार ले के आइये।

डॉ अनिल जैन उपहार

Tuesday, August 18, 2020

आओ पेड़ लगाए

धरती को खुशहाल बनाए 
आओ मिलकर पेड़ लगाए।
जीवन की हर श्वास का यारों
इन पेड़ों से गहरा नाता।
इनके बिना नही कोई मौसम
और न कोई मन को भाता।
जीवन का आधार पेड़ है
स्वर्णिम युग का सार पेड़ है।
इनमे गीत ग़ज़ल कविता है ।
इनसे ज़िंदा जीवन सविता है।
अधरों की मुस्कान पेड़ है।
त्योहारों का श्रृंगार पेड़ है ।
आओ सब मिल पेड़ लगाए।
धरती को खुशहाल बनाए।

डॉ अनिल जैन उपहार

Monday, August 17, 2020

गीत (हमसफ़र)

राह में वो मिला हमसफ़र होगया।
ज़िन्दगी का मुकम्मल सफर हो गया।
इक अनोखी मुलाकात कुछ यूँ रही
साथ मे थी दुआए  असर होगया।

बनके साया चला था जो उस राह में
दर्द लिखता गया उसकी हर चाह में
गीत अधरों से निकला अमर होगया
वाह होती रही दिल की हर आह में।

रीत हमको निभानी पड़ी बस यहाँ
हर कदम पर लगी ठोकरे बस यहाँ।
ज़िंदगी वक्त के हाथों छलती रही
प्यार की प्यार से हार है बस यहाँ।

डॉ अनिल उपहार

मुक्तक

राह में जो मिला हमसफ़र होगया।
जिंदगी का मुकम्मल सफर होगया।
इक मुलाकात ऐसी अनोखी रही
साथ मे थी दुआए असर हो गया ।

डॉ अनिल उपहार

मुक्तक (मुस्कुराई ग़ज़ल)

मुस्कुराई ग़ज़ल नज़रे पढ़ने लगी अधरों ने एक मीठा सा स्वर दे  दिया।
वक्त के भाल पर बंदिशे खूब थी
 गीत ने प्रीत का हर जखम भर दिया।

माना रुसवाइयों का चलन ओर था तुमने हँसकर सहा हमने हँसकर कहा ।
हर शरारत चिढ़ाती रही रात भर बस सफर बिन तुम्हारे अधूरा रहा।

डॉ अनिल जैन उपहार

मुक्तक आँसू

कभी उलझे हुए सवाल से लगे आँसू।
कभी जटिल सी इक किताब से लगे आँसू।
राज हँसने का बयां कर गए सारे पल में
दर्द को सबसे छुपाने लगे है अब आँसू।

डॉ अनिल उपहार

Sunday, August 16, 2020

दिल कहता है (गीत)

दिल कहता है गीत सुनाऊ आ तुझको मन का मीत बनाऊ।
रिश्तों का उपमान बदलकर अलंकार से रीत बनाऊ।
माना छंद बना है जीवन चलन ज़माने का गहरा है।
आस अधूरी रही मिलन की उम्मीदों पर भी पहरा है।
मन देहरी पर अक्षत धर कर खूब करू मनुहार मनाऊ।
हृदय पटल पर शब्द धरु में सचमुच ऐसी प्रीत निभाऊं।
मन से मन का मिलन करा दे ऐसा कोई गीत सुनाऊ।

दर्द भी चुप अधरों से बोले नयनों के सब मौन इशारे।
कैसे कब तक राह निहारे ये सावन की मस्त फुहारें ।
आजाओ अब नेह पुकारे तुझको मितवा मीत पुकारे।
छंद तुम्ही नवगीत तुम्ही तुमसे ही हर बन्ध सजा रे।

डॉ अनिल जैन उपहार

सम्मान प्राप्त करते हुए

स्वतंत्रता दिवस समारोह में राष्ट्रगान करते हुए

उपखण्ड स्तरीय स्वतंत्रता दिवस

Sunday, August 9, 2020

गीत (दुर्दिनों का सफर)

दुर्दिनों का सफर तुम क्या जानो
दर्द छालों के हमने सहे है ।
तुमको सब कुछ मिला जिंदगी में
हम अभावों के पाले रहे है ।

सर्द रातों में जलता रहा हूँ
हिमगिरि सा पिघलता रहा हूँ।
ओढ़ इज्ज़त का सर पे दुशाला
ढलते सूरज सा ढलता रहा हूँ।
भोर ने भी कभी ना दुलारा
दूर हमसे उजाले रहे है।

चाहतों ने दिये जब जलाए।
वक़्त ने अपने हाथों बुझाए।
इस कदर बेबसी ने है घेरा
हम जिये भी और जी भी न पाए

ना खुशी ही कभी रास आई
उम्मीदों पर भी पहरे रहे है ।

देहरी के दिये सा जला हूँ
हर कदम खुदही खुद से छला हूँ।
थक न जाऊं सफर में कहीं मैं
बन के बैसाखी लम्बा चला हूँ।

हसरतें भी रही सब अधूरी
सिर्फ तानों के साये रहे है ।

घर की छत थे तभी तो टिके है ।
गर्म झोंकों से पल पल सिके है ।
ज़िम्मेदारी के बोझ तले हम
जाने कब कब ओ कैसे बिके है ।
दाव जब जब चला ज़िन्दगी ने 
हम ही हर बार हारे रहें है ।
तुमको सब कुछ मिला ज़िन्दगी में

आइये मिलते है अपने गीतों के साथ

संचालन का अंदाज़

Saturday, August 8, 2020

मुक्तक

महक जाये धरा मन की मैं ऐसा इत्र लाया हूँ ।

अदब और संस्कारों से सजा वो चित्र लाया हूँ ।

डिगा सकते नही जिसको चलन भी दोगलाई के 

रखे महफूज़ दिल में राज़ ऐसे मित्र लाया हूँ ।

अनिल उपहार

मधुर यादें

Friday, August 7, 2020

कविता

 महक जाये धरा मन की मैं ऐसा इत्र लाया हूँ ।


अदब और संस्कारों से सजा वो चित्र लाया हूँ ।


डिगा सकते नही जिसको चलन भी दोगलाई के 


रखे महफूज़ दिल में राज़ ऐसे मित्र लाया हूँ ।


अनिल उपहार

मुक्तक

 महक जाये धरा मन की मैं ऐसा इत्र लाया हूँ ।


अदब और संस्कारों से सजा वो चित्र लाया हूँ ।


डिगा सकते नही जिसको चलन भी दोगलाई के 


रखे महफूज़ दिल में राज़ ऐसे मित्र लाया हूँ ।


अनिल उपहार