क़तरा-ए-अश्क़ बनके टपकता रहा हूँ मै ।
अंगार की मानिंद दहकता रहा हूँ मै ।
मेंहंदी से लिखा नाम हथेली पे जो उसने
खुशबू से सारी रात महकता रहा हूँ मैं।
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अनिल डॉ अनिल जैन उपहार
क़तरा-ए-अश्क़ बनके टपकता रहा हूँ मै ।
अंगार की मानिंद दहकता रहा हूँ मै ।
मेंहंदी से लिखा नाम हथेली पे जो उसने
खुशबू से सारी रात महकता रहा हूँ मैं।
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अनिल डॉ अनिल जैन उपहार
कौन कहता है कि
सिर्फ सुसराल में ही
होती है सास,ननद,देवर
मायके में भी होती है
सास,ननद,देवर
जो करते रहते है
बात बात पर टोका टोकी,
जिस दिन होती है
घर मे शांति तो-
मुहल्लेवाले समझ जाते है
खुद ब खुद
कि यातो बेटियाँ ब्याह दी गयी है
या फिर भेज दी गयी है
लंबी छुट्टी पर,
यह पढ़ने के लिए
कि वो पहले भी पराई थी
और आज भी है पराई
अपनी नियति को समझने ।
डॉ अनिल जैन उपहार
आज मातृ दिवस पर
,,,,,,,,,,,,
कहने को तो अनपढ़ थी वो
पर ,
सबको पढ़ लेने का अज़ीब सा
हुनर था उसमें,
संस्कारों के समृद्ध विश्वविद्यालय की
कुशल प्राध्यापक थी वो।
पत्थर को तराश कर
हीरा बनाने की अदभुत कला थी
उसमे,
आशीषों में उठने वाले उसके हाथ
नित नयी प्रेरणा व ऊर्जा से
पूरे आँगन को कर देते थे
अभिमंत्रित,
काश मैं समझ पाता
माँ होने की परिभाषा
और लिख पाता कोई महाकाव्य
अपनी माँ पर।।।।
डॉ अनिल जैन उपहार