इस बारिश कुछ इस तरह
भीगा जाये
कुछ उलाहनों की नदियां हो
शिकायतों की तलैया हो
और हम अपनो के साये में
बेखोफ कूद जाये
रिश्तो के सागर में ।
जहाँ नेह के अदभुत
झरने थाम ले
बेइंतहा प्रतीक्षा की
घड़ियों को ।
देहरी खोल दे बन्द द्वार
दमक उठे कल्पना के
सतरंगी इंद्रधनुष
आओ मिलकर भरदे
इनमें कुछ रंग ।।।
अनिल जैन उपहार