मन
अनुभव के बीज लिये
संवेदना की जमीन पर
टटोलता रहा नमी
कि
रचना की पैदावार
हो अच्छी,
और
भाषा की नई तहजीब गढ़ दे,
बना रहे
भाषा का
शील ।।।।।
शायद यही है
कवि मन का उदबोधन।।।
डॉ अनिल जैन उपहार
मन
अनुभव के बीज लिये
संवेदना की जमीन पर
टटोलता रहा नमी
कि
रचना की पैदावार
हो अच्छी,
और
भाषा की नई तहजीब गढ़ दे,
बना रहे
भाषा का
शील ।।।।।
शायद यही है
कवि मन का उदबोधन।।।
डॉ अनिल जैन उपहार
वक्त के थपेड़े
तोड़ देना चाहते थे
सारा भरम
जो पाल रखा था
सुनहरी आंखों ने ।
देह की दस्तक पर
पड़े हर एक निशां को,
मिटा देना चाहती थी
संवेदन हीनता की स्याही,
बेचारे अल्फ़ाज़ देते रहे
गवाही हर बार की तरह ।
उसने तो लिख दिया था
हलफनामा
अपनी बेगुनाही का।
न्यायाधीश बना मन
सुनना ही कहाँ चाहता था
कोई और दलील ।
बस इंतज़ार है
फैसले का ,जिसे मानना है
नही चाहते हुए भी ।
डॉ अनिल जैन उपहार