Tuesday, March 2, 2021

मुक्तक

कैसा दस्तूर है ये कैसा चलन आया है ।
बदलते दौर ने खोया भी बहुत पाया है ।
है  परिंदों के सर पे आसमा की चादर पर
लगा पंखों पे क्यूँ दहशत का घना साया है।

डॉ अनिल जैन उपहार