Thursday, September 3, 2015

काव्यांजलि

हमने खाई थी कसम लौट के ना आने की ।



तेरी महफिल से सरे राह चले जाने की ।



अजीब सी थी कशिश तेरी हँसी चितवन में 



मै तो मुजरिम था सजा पाई उस फ़साने की ।



---------अनिल उपहार ------काव्यांजलि

काव्यांजलि

हमने खाई थी कसम लौट के ना आने की ।



तेरी महफिल से सरे राह चले जाने की ।



अजीब सी थी कशिश तेरी हँसी चितवन में 



मै तो मुजरिम था सजा पाई उस फ़साने की ।



---------अनिल उपहार ------काव्यांजलि

काव्यांजलि

हमने खाई थी कसम लौट के ना आने की ।



तेरी महफिल से सरे राह चले जाने की ।



अजीब सी थी कशिश तेरी हँसी चितवन में 



मै तो मुजरिम था सजा पाई उस फ़साने की ।



---------अनिल उपहार ------काव्यांजलि

Saturday, March 28, 2015

कविता

--------औरत -----
-------------------

रोज़ की भागम भाग

सीने में दबाए दहकती आग

वक़्त की मार,

तानों की बोछार,

दोहरी जिन्दगी को

ढो रही सदियों से

अपनों से छली गई,

तंदुर में तली गई,

समर्पण की त्रासदी को

कब तलक पीती रहेगी ?

हाँ -

यह औरत है ।

सब कुछ सहती रहेगी ।

बीवी किसी की

बेटी किसी की

बहन किसी की

माँ किसी की

सब कुछ लुटाकर अपनों के बीच

खुद को मिटाकर

देहरी के दीप सी

जलती रहेगी ।

हां

यह औरत है

सब कुछ सहती रहेगी ।

------अनिल उपहार --------
तू भी अश्कों के समंदर में नहाया होगा

चेन तुझको भी कई रोज़ ना आया होगा

वो मुझे भूल गयी इसकी शिकायत ही नही ।

दर्द तो ये है के रो रो के भुलाया होगा ।

------अनिल उपहार -------
कहाँ होगा सफ़र पूरा निगाहें कुछ नही कहती ।

किसी की आस मन में हो तो बाहें कुछ नही कहती ।

मिलेंगी मंजिले हमको यक़ीनन पथ कंटीला है

तुम्हे मालूम तो होगा कि राहें कुछ नहीं कहती ।

--------अनिल उपहार -------

मुक्तक

रहा न मन का धीर कहो अब कैसे कोई गीत लिखूँ ।

छंदों के क्रंदन वंदन में कैसे मन का मीत लिखूँ ।

आवागमन नियति है जग की स्थिरता मीठा भ्रम है

तुमको पाकर सब कुछ भूला हार लिखूँ या जीत लिखूँ ।

-----------@अनिल उपहार ----
-------शब्द-----------
----------------------

शब्द प्रात:कालीन समीरण का नाद है ,
निरंकुश उड़ने वाले पक्षियों का आल्हाद है,
वियोगी का उन्माद है ।
शब्द अखंड ज्योति है ।
जिससे ऊर्जा पाकर
समग्र जीवन में
खिलने लगते है विश्वास के फूल,
जलने लगते है आस्था के दीप
और
फूटने लगते है कल्पना के स्त्रोत
जो नदी बनकर समाहित हो जाते है
विचारों के गहरे समंदर में ।

शब्द अनुभूति की माटी
और संवेदना के जल से
विचारों को गूँथ कर
रचना को देता है आकार ।
बनाता है सपनों को साकार ।

शब्द कभी करता है विचरण
घने जंगलों में ,
तो कभी मिलन की अमराईयों में ।
कभी प्यार बनकर खनकता है
प्रियतमा की पायल और चूड़ियों में ।

शब्द साधना का संगीत है ।
संस्कृति का संवाहक है ।
विचारों का वैभव है ।
भावनाओं का भंडार है ।
संस्कारों का सागर है ।
चेतना का आधार है ।
जीवन की धुरी है ।
इसके बिना सृजन की यात्रा अधूरी है ।

------------@अनिल उपहार ----

मुक्तक

घायल मन का गीत है गजल भयी उदास ।

पाती असुवन से लिखूं रहे न साजन पास ।

रिश्तों की इस डोर का रहा नही अब पार ।

स्वारथ ने जब खींच दी घर में बीच दीवार ।

--------अनिल उपहार -------
पहने लाज़ का घूँघट ये शानों पर मचलती है ।

गूँथ कर फिर ख्यालों में यहाँ हसरत बहलती है ।

बड़े दिल कश फ़साने है मुहोब्बत की इबारत के

नहीं मालूम था की इश्क में दुनियाँ बदलती है ।

--------अनिल उपहार -------
मिले जो ज़ख्म उल्फत में उन्हें अपना बनालूं में ।

तेरे हर अश्क कों पलकों पे अपने आ सजालूं में ।

मिली रुसवाईयां हमको भले ही इस ज़माने में

हजारों ग़म भुलाकर के तुझे अपना बनालूं में ।

-------अनिल उपहार ------

मुक्तक

चलो छंदों की पायल में तुम्हे फिरसे सजालूं में ।

मेरी गजलो का तू उन्वान है मतला बनालूं में ।

घायल गीत है तुम बिन सिसकती हर रुबाई है

हजारों गम भुलाकर के तुझे अपना बनालूं में ।

----------अनिल उपहार -------
चलो छंदों की पायल में तुम्हे फिरसे सजालूं में ।

मेरी गजलो का तू उन्वान है मतला बनालूं में ।

घायल गीत है तुम बिन सिसकती हर रुबाई है

हजारों गम भुलाकर के तुझे अपना बनालूं में ।

----------अनिल उपहार -------

मुक्तक

कभी यह दिन भी आएगा ज़रा विश्वास करते तुम ।

हमारी सीख का न इस तरह उपहास करते तुम ।

दिए हर बार तुमने ज़ख्म हँस कर सह लिए हमने

हमारे दर्द का जो गर कभी अहसास करते तुम ।

--------अनिल उपहार ----
आतंकवाद के सायें में ही अपना तन मन वार रहे ।

उन्माद बना जेहाद यहाँ वो हद अपनी कर पार रहे ।

मासूमों की किलकारी भी इनकों रास नहीं आई

यौवन के दुश्मन जो थे वो बचपन कों भी मार रहे ।

---------अनिल उपहार ------

Friday, March 27, 2015

ओ दरिंदो(कविता)

ओ इंसानियत के दरिंदों
अमन के दुश्मनों
मज़हब को जेहाद का
ज़ामा पहनाने वालों
मासूमों के खून में
कलम डुबोकर
अपनी माँ कों
ख़त लिखना ।
कि माँ
हमने अपने कृत्यों से
आज तेरी कोख़ कों
दुनियां में शौहरत दिला
तेरे दूध कों
शर्मसार कर दिया ।

उग्रवाद की ज़मीन पर
आतंक के बीज बोने वालों
शायद तुम नहीं जानते -
कि
जिन बस्तों कों तुमने
अपनी गोलियों का निशाना
बनाया
उस बस्ते का एक भी अक्षर
अगर बिखर गया
तो शब्दों की गूंज
तुम्हारी गोलियों की गूंज को
नेस्त नाबुत कर देगी ।

पर तुम्हें इससे क्या ?
तुमको कहाँ अंदाज़ा ?
पूछो उस माँ से
जो अब कभी
टिफिन नही बांधेगी ।
पूछो उन बूढी आँखों से
जो उनसे लिपट कर कहेगी
कि बाबा हम स्कूल से लौट आये ।

सजे धजे ये कोमल
मासूम से बच्चे
जिन्हें पलने में होना था
तुमने
ताबूत कैसे दे दिया ????????

---------अनिल उपहार -------
हर व्यथा उत्कर्ष की नव द्वार है ।

प्रत्यूष,ग़म की रात का श्रंगार है ।

मधुर मुस्कान फूलों की ,धरा पर

संघर्ष से उपजा अनोखा प्यार है ।

---------अनिल उपहार ------
रागिनी राग से जब अलग होगयी ।

नींद आँखों में पली ख्वाब तलब होगयी।

जाती रही उम्मीद की हर किरण दूर तक

चांदनी चाँद से कल अलग होगयी ।

------अनिल उपहार -----
वो ज़ख्मों को मेरे सहने नही देता ।

रहूँ तनहा तो तनहा रहने नही देता ।

अजीब सियासत है रिश्तों के दरमियाँ

दर्द देता है अश्कों को बहने नही देता ।

----------अनिल उपहार ------
तहजीब का सुहाना वो मंज़र छोड़ आये है ।

मुहोब्बत के वो सारे शजर छोड़ आये है ।

चादर से जियादा पांव फैला लिए हमने

पुरखों का हम वो गाँव वो घर छोड़ आये है ।

-------अनिल उपहार --------
कहाँ होगा सफ़र पूरा निगाहें कुछ नही कहती ।

किसी की आस मन में हो तो बाहें कुछ नही कहती ।

मिलेगी मंजिले हमकों यक़ीनन पथ कंटीला है

तुम्हे मालूम तो होगा की राहें कुछ नहीं कहती ।

-----------अनिल उपहार -----

मुक्तक (देखलो ये चाँद तारे)

थी सुहानी सुबह जीवन की वही अब दोपहर है ।

गिरती हुयी दीवार यारों थामना अब बेअसर है ।

दी ज़माने को चूनौती हर कदम हमने ,तभी तो

देखलो ये चाँद तारे अब भी मेरे हम सफ़र है ।

---------अनिल उपहार ------
प्यार के मंदिर में पलती आस्था लाचार क्यों है ?

सदभावों की रोशनी देकर शमा बेजार क्यों है ?

बेबस परिंदे से कभी भी भूल कर मत पूछिये ।

शज़र सूखे हुए है ,पत्तियाँ बेजार क्यों है ?

----------अनिल उपहार ------
परिवर्तन के नये क्षितिज पर समृद्धि का सूर्य उदय हो ।

नया वर्ष मंगल मय सबको नया वर्ष मंगल मय हो ।

कण कण महक उठे धरती का तन मन पुलकित हो जगती का ।

चिर आभाव से शापित जीवन को वरदान मिले मुक्ति का ।

शस्य श्यामला भारत माता अभय अखंड अजेय हो ।

नया वर्ष मंगल मय सबको नया वर्ष मंगल मय हो ।

------अनिल उपहार ------
नव प्रभात की नई किरण हो पुलकित हो हर भाल ।

नई चेतना नया सृजन हो ,हो मंगल मय यह साल ।

-------अनिल उपहार --------
उम्मीदों का हँसी सावन बरसता छोड़ आया हूँ ।

मै अश्कों के समंदर कों उफनता छोड़ आया हूँ ।

कागज़ी चंद टुकड़ों ने बना खुद गर्ज़ जब डाला

मेरी माँ की निगाहों कों तरसता छोड़ आया हूँ ।

----------अनिल उपहार ------
विरह के दोहे

------------------

विरह यातना शरद की ,सखियों का श्रंगार ।
बिना मिलन कैसे थमे ,स्मृतियों का ज्वार ।

पौष मास दिन धूजणी,हाड कंपाती रात ।
बिन सजना नैना करे,गौरी के बरसात ।

दंश लीलते स्मृतियों के,गौरी का सुख चैन ।
मौसम भी निष्ठुर हुआ ,गीले रहते नैन ।

--------अनिल उपहार --------
पलें जो खार दामन में ज़रा उनकों गला देना ।

मिलें जो दंश अपनों से उन्हें दिल से भुला देना ।

उजाले फिर न भटकेंगे कभी ग़म के अंधेरों में

कभी जो थे बुझे दीपक ज़रा फिरसे जला देना ।

-----------अनिल उपहार -------
कजरारे तीखे नयन ,आनन् अमरस घोल ।

गौर वर्ण आभा लिए ,दमके मृदुल कपोल ।

----------अनिल उपहार ------
प्रीत का अनुबंध सरे आम कर दिया ।

लो जिन्दगी को हमने तेरे नाम कर दिया

चाहत थी तेरे संग गुज़र जाये जिन्दगी

पर तूने मेरे प्यार को बदनाम कर दिया ।


---------अनिल उपहार --------
देखा तुम्हारा चेहरा तो गुलाब सा लगा ।

उलझे हुए सवाल के जवाब सा लगा ।

आँखों में देखा सैकड़ों पहेलियाँ मिली

नज़रों ने पढ़ के देखा तो किताब सा लगा ।

----------अनिल उपहार -------
संशोधन के बाद पुनः --------
---------------------
टूटे हुए दिल का कभी मै प्यार लिखता हूँ ।

कभी मै दर्द में भीगे हुए अशआर लिखता हूँ ।

सिखाया है हुनर मुझकों मेरी माँ की दुआओ ने

ख़लिश को प्रीत का मै दोस्तो उपहार लिखता हूँ ।

---------अनिल उपहार -------
बुजुर्गो की दुआओ का मिला जब से ख़जाना है ।

नही है बात यह झूटी मगर किस्सा पुराना है ।

अँधेरी रात में तारे करे जब खुद ही अगवानी

मुहोब्बत थी मुहोब्बत है मुहोब्बत का ज़माना है ।

---------अनिल उपहार ------
एक पल तो वक़्त के सांचे में ढल कर देखिये ।

रंग जीवन के अधुरे फिरसे भरकर देखिये ।

ग़म के छितराए ये बादल एक दिन छंट जायेंगे ।

कुछ कदम तो साथ मेरे आप चलकर देखिये ।

----------अनिल उपहार ------
सात्विकता का भाव जीवन कों यहाँ भाता नही ।

जिन्दगी की साधना का गान वो गाता नहीं ।

खंडहरों की बेबसी में गूंजती है ये सदा

अब लबों पर नाम वो आता नहीं ।

--------अनिल उपहार -------

पतंगे (मकर सक्रांति)

जीवन में विश्वास जगाती ।
देखो उडती आज पतंगें।

सदभावों के गीत सुनाती ।
देखो उडती आज पतंगें ।

अंधकार हारेगा निश्चित ।
जुगनुओं में होड़ लगी है ।

सूरज से बतियाती लगती ।
देखो उडती आज पतंगें ।

नहीं परिंदा कोई फसेगा ।
नफरत की इस डोर में ।

जियो और जीनेदो सबकों ।
कहती उडती आज पतंगें ।

मकर सक्रांति की हार्दिक शुभ कामनाये ।
---------अनिल उपहार ------
रहने को भले छत नहीं उनका ज़हान है ।

दो वक़्त की रोटी ही उनकी आरती अज़ान है ।

तीज और त्यौहार की तो बात ही हम क्या करें

मुफलिसों के वास्ते ताजिंदगी रमजान है ।

-------अनिल उपहार ------
लिख कर पाती उजियारों कों

     भोर सुहानी लाती है ।

अंधियारे को राह दिखाती

      मंगल गीत सुनाती है ।

धरती की आभायें नूतन,

     छटा स्वयं बिखराती हैं ।

पुण्य धरा कों वंदन करने

      रवि की किरणे आती है ।

--------अनिल उपहार ------
लगाकर ज़ख्म सीने से दिया तुमने सहारा है ।

मेरी चाहत के पंखों कों तुम्हीं ने तो संवारा है ।

गये तुम छोड़कर मुझको हुए गुम किन अंधेरों में

अँधेरे छोड़कर आओ उजालों ने पुकारा है ।

---------अनिल उपहार ------
प्यार में कभी फिसल कर देखो ।

अंधियारों कों निगल कर देखो ।

 खाकर ज़ख्म संभल कर देखो ।

गोद में माँ की मचल कर देखो ।

सोच पुरानी बदल कर देखो ।

खुशियों से भर जाओगे तुम

घर से ज़रा निकल कर देखो ।

--------अनिल उपहार ----
दायित्वों पर चल कर देखो ।

दीपक सम तुम जल कर देखो ।

मुफलिसी में पल कर देखो ।

पर हित मित्रों गल कर देखो ।

विश्वासों में ढल कर देखो ।

फूलों से खिल जाओगे तुम ।

घर से ज़रा निकल कर देखो ।

-------अनिल उपहार -----
-----शायद तुम लौट आओ ------
----------------------------

मन का मरुस्थली सन्नाटा तोडती
तुम्हारी यादें
घोल देती थी
देह की हर दस्तक में मिठास ।

पलकों पर सजे सिंदूरी स्वप्न ।
बार बार देते निमंत्रण
मन देहरी पर
भावनाओं के
अक्षत चढाने कों ।

संस्कारों की सड़क के मुसाफिर सा
तुम्हारा बेखोफ चलना ।
तहजीब की ग्रंथावली के
कोमल किरदार को
सलीके से निभाना ।

पढ़ा देना बातों ही बातों में
मर्यादा का पाठ ।
विरदा वलियों का संवाद ।
जिसने रिश्तों के रंग मंच पर
अपना अभिनय
बखूबी करना सिखाया ।

अचानक-
वक़्त की आई तेज आंधी ने
सब कुछ
बिखेर कर रख दिया ।
और धूल धुसरित कर दिया
उन सभी रिश्तों कों ,
जिनकी छाँव में
हमने जीवन के सतरंगी सपनों को
बुना था ।

कहने कों अब नहीं हो
साथ मेरे ।
पर आज भी अहसास ज़िन्दा है
मन के किसी कोने में ।

तुम्हारा शांत नदी सा बहना ।
लहरों सा अठ खेलियाँ करना ।
और
अचानक छोड़ कर चल देना ।

मेरे गीत और छंद सूने है
तुम्हारे बगेर ।
फिर भी विश्वास है कि -
तुम लौट आओगे
और
अधरों पर गीत बन
बिखेर दोगे
अपने माधुर्य की ताज़गी ।
मै अपने गीत और छंद
तुम्हारे नाम करता हूँ ।
श्रध्दा की पावन प्रतिमा
मै तुम्हें प्रणाम करता हूँ ।

--------अनिल उपहार -------
मिला हमकों क्या उल्फत में चलो वो आज लिखते है ।

मनुजता के फटे आँचल कों मिलकर साथ सिलते है ।

दिए है अश्क दुनियां ने कोई लेखा नहीं रखता

मुहोब्बत में मिले कितने चलो अब ज़ख्म गिनते है ।

--------अनिल उपहार -------
दंभ दलन करने वाला वह,पौरुष फिर दिखला जाओ ।

नापाक साजिशों कों आकर,मिट्टी में उन्हें मिला जाओ ।

भ्रष्टाचारी विश्दंतों से ,सबकों मुक्त करा जाओ ।

शंखनाद हो आज़ादी का,ऐसा बिगुल बजा जाओ ।

------------अनिल उपहार -----
जोड़कर दोनों हाथों कों श्र्द्धाओं के

तुझ कों करता हूँ अर्पित सुमन शारदे

दास चरणों का अपने मुझे जान कर

कर ले स्वीकार मेरा नमन शारदे ।

-----------बसंत पंचमी की हार्दिक शुभ कामनाये ।
--------------अनिल उपहार -----

चिठ्ठी में (मुक्तक)

कुछ अपनों का नाम लिखा है चिठ्ठी में ।

जीवन है संग्राम लिखा है चिठ्ठी में ।

गैर को उसने अपना माना भूल हुयी

ये भी इक पैगाम लिखा है चिठ्ठी में ।

----------अनिल उपहार -----
रिश्तों कों व्यापार लिखा है चिठ्ठी में ।

दौलत कों बाज़ार लिखा है चिठ्ठी में ।

राखी के धागे ने सब कुछ लूट लिया

ये भी इक पैगाम लिखा है चिठ्ठी में ।

-------अनिल उपहार -------
प्रणय गीत सी तुम हो पावन ।

रूप राधिका सा मन भावन ।

उर के कोमल पृष्ठों पर

नूतन विधान सी लगती हो ।

मेरे मन की संसद का

तुम संविधान सी लगती हो ।

--------अनिल उपहार ------
मेरी चाहत की कश्ती को सदा आबाद रखियेगा ।

मिलन की हर घडी होठों पे बस फरियाद रखियेगा ।

भरोसा क्या है सांसों का न जाने कब ये थम जाये ।

दुआ जब भी करों हमकों दुआ में याद रखियेगा ।

----------अनिल उपहार ------
रस्मे उल्फत की अपने दिल में रवानी रखना ।

फिर से मिलने ओ मिलाने की कहानी रखना ।

लाख हो जुल्म के पहरे वफ़ा की राहों में

अपनी आँखों में मुहोब्बत की निशानी रखना ।

----------अनिल उपहार ------
आज हमारी माताजी की पुण्य तिथि है जो आज ही के दिन अपनी अनंत यात्रा पर प्रस्थान कर गयी थी ।उन्हीं को समर्पित कुछ शब्द सुमन ।।।।।।

-------माँ------------

तुमने संस्कारों के बीज रोप

संघर्षों के झंझावात और

असहनीय पीड़ा को भोगते हुए

लगाया था जो बिरवा ,

आज पल्लवित और पुष्पित होते देख

मन ही मन प्रसन्न होती थी तुम ।

        हे माँ !

तुम्हारी रिक्तता अब नही भर पायेगी

मन के सूने पन कों ।

उदासी और संस्कारों के स्पंदन को ।

लेकिन तुम्हारी दुआओ के दीप जगमगाएंगे ,

रोशन करेंगे सूनी राहों को ,

प्रकाशित करेंगे ,उदास हवाओं को ।

काश ! मै समझ पाता माँ होने की परिभाषा

और लिख पाता एक महाकाव्य तुम पर

मेरे गीत और छंद पुकारते है तुमको

लेकिन मै जानता हूँ कि तुम कभी नहीं लौटोगी उस यात्रा से

हे ! ममतामयी ,देवी स्वरूपा,

वात्सल्य मूर्ति माँ !तुम्हें अनंत प्रणाम ।।

--------अनिल उपहार -----
प्रिये कविता बन ढल जाना अधरों पर तुम छाने कों ।

अक्षर अक्षर गीत है मेरा व्याकुल मै भी गाने कों ।

प्रणय निवेदन की बेला का कोई मुहूर्त नहीं होता

छंदों की मै पायल लाया प्यार तुम्हारा पाने कों ।



-----------अनिल उपहार -------
नही हमकों गिला कुछ भी चलो इकरार करते है ।

उम्मीदों के चमन को फिर गुले गुलज़ार करते है ।

सहे है ज़ख्म उल्फत में ये माना साथ में हमने

चलो फिर से हम अपने प्यार का इज़हार करते है ।

----------अनिल उपहार -------
दुःख की बदली छा जाती तब

        गीत विरह के गाती है ।

अमराई को कोयल तरसे ।

          सूनी सेज जलाती है ।

महंदी हाथों की सिसक रही ।

         महावर भी शर्माती है ।

पछुआ के अनुरागी सुन रे ।

        पुरवा तुझे बुलाती है ।

--------अनिल उपहार -------
धरा की मांग भरने का हँसी श्रंगार का दिन है ।

मिलन के गीत मंगलगान मंगलाचार का दिन है ।

ह्रदय आँगन में उतरा प्रेम था जब अवतरित होकर

सुना है आज का दिन प्यार के इकरार का दिन है ।

---------अनिल उपहार -----
बरसों से मचलती चाह के इज़हार का दिन है ।

संस्कारों में लिपटी आह के इंकार का दिन है ।

मन देहरी पर प्रीत के कुछ अर्घ रख आयें

सुना है आज का दिन प्यार के इकरार का दिन है ।

-----------अनिल उपहार -------
बाबुल के सपनों की शोभा ,माँ के संस्कारों की थाती ।

जज्बाती पन्नों पर अबतक ,लिखती रही प्यार की पाती ।

मै देहरी का दीप हूँ पगले ,दोनों घर मुझसे रोशन

विश्वासों से पुलकित करता ,मुझकों मन का वृन्दावन ।

---------अनिल उपहार -------
दिया उम्मीद का जगमगाने को है ।

फिजा में ताजगी देखो छाने को है ।

यह किसने दरवाज़ा खुला छोड़ दिया

लगता है वो अब आने को है ।

---------अनिल उपहार ------

मुक्तक

चले गर वक़्त की आंधी संभलना मत उछल जाना।

कहीं तुम देखकर रंगी नजारे मत मचल जाना।

न डरना तुम ज़माने की बदलती इन फिजाओं से।

भले बदले यहाँ मौसम मगर तुम मत बदल जाना ।

-------अनिल उपहार ------
मिलन के सपने चूर मत करना ।

 अपनी नज़रों से दूर मत करना ।

गैर के डर से छोड़ जाओ कहीं

ज़ुल्म ऐसा हुजुर मत करना ।

-------अनिल उपहार ------
राह कंटीली बेशक हो पर हँस कर फूल बिछाओ तुम ।

सन्नाटे टूटे हर एक दिल के ऐसा मृदंग बजाओ तुम ।

भीषण ज्वाला नफरत की ये छींटे हो सदभावो के

मानव हो तो मानवता का सच्चा धर्म निभाओ तुम ।

---------अनिल उपहार --------
कभी नजरे चुराती है कभी नजरे मिलाती है ।

शरारत से भरी चितवन कभी बिजली गिराती है ।

ठहर जाता है गुजरा वक़्त धड़कन तेज होजाती

तुम्हारे मुस्कुराने की अदा पागल बनाती है ।

---------अनिल उपहार ------
वो अश्कों को मेरे जाया कभी होने नही देता ।

भूलकर भी मुझे तन्हा कभी होने नही देता ।

मेरी सांसों में बजती हर घडी यादों की शहनाई

किसी अब और का भी वो मुझे होने नही देता ।

---------अनिल उपहार -------
उसका करम हुआ तो मालामाल कर दिया ।

बेबसी की धूप ने क्या हाल कर दिया ।

किस्मत के लिखे को यहाँ कौन धो सका

बेवक्त की बरसात ने बेहाल कर दिया ।

-------अनिल उपहार ------
इक छुअन से देह महकी रातरानी होगयी ।

चंद लम्हे साथ गुजरे तो कहानी होगयी

आस का दीपक जला जबसे प्रिये मन देहरी पर

तुम मिले तो प्रेम सी ये जिंदगानी होगयी ।

------अनिल उपहार -----
यश की वंदन वार सजेगी नवरातो की बेला में ।

खुशियों की सौगात मिलेगी नवरातो की बेला में ।

श्रध्दा से बस चौखट चुमों मन में समता भाव लिए

माँ की ममता बरस रही है नवरातो की बेला में ।

---------अनिल उपहार ------
यश की वंदन वार सजेगी नवरातो की बेला में ।

खुशियों की सौगात मिलेगी नवरातो की बेला में ।

श्रध्दा से बस चौखट चुमों मन में समता भाव लिए

माँ की ममता बरस रही है नवरातो की बेला में ।

---------अनिल उपहार ------
मेरा मकसद है यही तू सदा ही शाद रहे ।

उसकी रहमत से दिल की बस्ती भी आबाद रहे ।

मिलन के साथ जुदाई का दौर आता है ।

मै तुझमे और तू मुझमे ही जिन्दा बाद रहे ।

------अनिल उपहार ---------
भोर ने उजली किरण से धरा को फिर जगमगाया ।

फागुनी नवगीत रचकर होले से ये गुनगुनाया ।

देहरी की द्वार से न अब रहे कोई भी अनबन

भुलाकर सब लगाओ दिल नया देखो समय आया ।

----------अनिल उपहार ------
हारकर दिल की हुकूमत वो कहानी हो गयी ।

दिल के गमले में सजी और रात रानी हो गयी ।

अश्क भी करने लगे खुद रूप का जब आचमन ।

ये जिन्दगी खारी नही, अब मीठा पानी, हो गयी ।

--------anil उपहार -----

Wednesday, March 25, 2015

करें किस से गिला अब हम नही कोई हमारा है ।

तेरी चाहत के दर्पण ने हमे हर पल संवारा है ।

मिलन के साथ जुदाई का दौर आता है

तुम्हारे बिन यहाँ रहना नही हमकों गंवारा है ।

---------अनिल उपहार --------
करें किस से गिला अब हम नही कोई हमारा है ।

तेरी चाहत के दर्पण ने हमे हर पल संवारा है ।

मिलन के साथ जुदाई का दौर आता है

तुम्हारे बिन यहाँ रहना नही हमकों गंवारा है ।

---------अनिल उपहार --------