Friday, September 4, 2015
Thursday, September 3, 2015
काव्यांजलि
हमने खाई थी कसम लौट के ना आने की ।
तेरी महफिल से सरे राह चले जाने की ।
अजीब सी थी कशिश तेरी हँसी चितवन में
मै तो मुजरिम था सजा पाई उस फ़साने की ।
---------अनिल उपहार ------काव्यांजलि
तेरी महफिल से सरे राह चले जाने की ।
अजीब सी थी कशिश तेरी हँसी चितवन में
मै तो मुजरिम था सजा पाई उस फ़साने की ।
---------अनिल उपहार ------काव्यांजलि
काव्यांजलि
हमने खाई थी कसम लौट के ना आने की ।
तेरी महफिल से सरे राह चले जाने की ।
अजीब सी थी कशिश तेरी हँसी चितवन में
मै तो मुजरिम था सजा पाई उस फ़साने की ।
---------अनिल उपहार ------काव्यांजलि
तेरी महफिल से सरे राह चले जाने की ।
अजीब सी थी कशिश तेरी हँसी चितवन में
मै तो मुजरिम था सजा पाई उस फ़साने की ।
---------अनिल उपहार ------काव्यांजलि
काव्यांजलि
हमने खाई थी कसम लौट के ना आने की ।
तेरी महफिल से सरे राह चले जाने की ।
अजीब सी थी कशिश तेरी हँसी चितवन में
मै तो मुजरिम था सजा पाई उस फ़साने की ।
---------अनिल उपहार ------काव्यांजलि
तेरी महफिल से सरे राह चले जाने की ।
अजीब सी थी कशिश तेरी हँसी चितवन में
मै तो मुजरिम था सजा पाई उस फ़साने की ।
---------अनिल उपहार ------काव्यांजलि
Saturday, March 28, 2015
कविता
--------औरत -----
-------------------
रोज़ की भागम भाग
सीने में दबाए दहकती आग
वक़्त की मार,
तानों की बोछार,
दोहरी जिन्दगी को
ढो रही सदियों से
अपनों से छली गई,
तंदुर में तली गई,
समर्पण की त्रासदी को
कब तलक पीती रहेगी ?
हाँ -
यह औरत है ।
सब कुछ सहती रहेगी ।
बीवी किसी की
बेटी किसी की
बहन किसी की
माँ किसी की
सब कुछ लुटाकर अपनों के बीच
खुद को मिटाकर
देहरी के दीप सी
जलती रहेगी ।
हां
यह औरत है
सब कुछ सहती रहेगी ।
------अनिल उपहार --------
-------------------
रोज़ की भागम भाग
सीने में दबाए दहकती आग
वक़्त की मार,
तानों की बोछार,
दोहरी जिन्दगी को
ढो रही सदियों से
अपनों से छली गई,
तंदुर में तली गई,
समर्पण की त्रासदी को
कब तलक पीती रहेगी ?
हाँ -
यह औरत है ।
सब कुछ सहती रहेगी ।
बीवी किसी की
बेटी किसी की
बहन किसी की
माँ किसी की
सब कुछ लुटाकर अपनों के बीच
खुद को मिटाकर
देहरी के दीप सी
जलती रहेगी ।
हां
यह औरत है
सब कुछ सहती रहेगी ।
------अनिल उपहार --------
मुक्तक
रहा न मन का धीर कहो अब कैसे कोई गीत लिखूँ ।
छंदों के क्रंदन वंदन में कैसे मन का मीत लिखूँ ।
आवागमन नियति है जग की स्थिरता मीठा भ्रम है
तुमको पाकर सब कुछ भूला हार लिखूँ या जीत लिखूँ ।
-----------@अनिल उपहार ----
छंदों के क्रंदन वंदन में कैसे मन का मीत लिखूँ ।
आवागमन नियति है जग की स्थिरता मीठा भ्रम है
तुमको पाकर सब कुछ भूला हार लिखूँ या जीत लिखूँ ।
-----------@अनिल उपहार ----
-------शब्द-----------
----------------------
शब्द प्रात:कालीन समीरण का नाद है ,
निरंकुश उड़ने वाले पक्षियों का आल्हाद है,
वियोगी का उन्माद है ।
शब्द अखंड ज्योति है ।
जिससे ऊर्जा पाकर
समग्र जीवन में
खिलने लगते है विश्वास के फूल,
जलने लगते है आस्था के दीप
और
फूटने लगते है कल्पना के स्त्रोत
जो नदी बनकर समाहित हो जाते है
विचारों के गहरे समंदर में ।
शब्द अनुभूति की माटी
और संवेदना के जल से
विचारों को गूँथ कर
रचना को देता है आकार ।
बनाता है सपनों को साकार ।
शब्द कभी करता है विचरण
घने जंगलों में ,
तो कभी मिलन की अमराईयों में ।
कभी प्यार बनकर खनकता है
प्रियतमा की पायल और चूड़ियों में ।
शब्द साधना का संगीत है ।
संस्कृति का संवाहक है ।
विचारों का वैभव है ।
भावनाओं का भंडार है ।
संस्कारों का सागर है ।
चेतना का आधार है ।
जीवन की धुरी है ।
इसके बिना सृजन की यात्रा अधूरी है ।
------------@अनिल उपहार ----
----------------------
शब्द प्रात:कालीन समीरण का नाद है ,
निरंकुश उड़ने वाले पक्षियों का आल्हाद है,
वियोगी का उन्माद है ।
शब्द अखंड ज्योति है ।
जिससे ऊर्जा पाकर
समग्र जीवन में
खिलने लगते है विश्वास के फूल,
जलने लगते है आस्था के दीप
और
फूटने लगते है कल्पना के स्त्रोत
जो नदी बनकर समाहित हो जाते है
विचारों के गहरे समंदर में ।
शब्द अनुभूति की माटी
और संवेदना के जल से
विचारों को गूँथ कर
रचना को देता है आकार ।
बनाता है सपनों को साकार ।
शब्द कभी करता है विचरण
घने जंगलों में ,
तो कभी मिलन की अमराईयों में ।
कभी प्यार बनकर खनकता है
प्रियतमा की पायल और चूड़ियों में ।
शब्द साधना का संगीत है ।
संस्कृति का संवाहक है ।
विचारों का वैभव है ।
भावनाओं का भंडार है ।
संस्कारों का सागर है ।
चेतना का आधार है ।
जीवन की धुरी है ।
इसके बिना सृजन की यात्रा अधूरी है ।
------------@अनिल उपहार ----
मुक्तक
घायल मन का गीत है गजल भयी उदास ।
पाती असुवन से लिखूं रहे न साजन पास ।
रिश्तों की इस डोर का रहा नही अब पार ।
स्वारथ ने जब खींच दी घर में बीच दीवार ।
--------अनिल उपहार -------
पाती असुवन से लिखूं रहे न साजन पास ।
रिश्तों की इस डोर का रहा नही अब पार ।
स्वारथ ने जब खींच दी घर में बीच दीवार ।
--------अनिल उपहार -------
मुक्तक
चलो छंदों की पायल में तुम्हे फिरसे सजालूं में ।
मेरी गजलो का तू उन्वान है मतला बनालूं में ।
घायल गीत है तुम बिन सिसकती हर रुबाई है
हजारों गम भुलाकर के तुझे अपना बनालूं में ।
----------अनिल उपहार -------
मेरी गजलो का तू उन्वान है मतला बनालूं में ।
घायल गीत है तुम बिन सिसकती हर रुबाई है
हजारों गम भुलाकर के तुझे अपना बनालूं में ।
----------अनिल उपहार -------
मुक्तक
कभी यह दिन भी आएगा ज़रा विश्वास करते तुम ।
हमारी सीख का न इस तरह उपहास करते तुम ।
दिए हर बार तुमने ज़ख्म हँस कर सह लिए हमने
हमारे दर्द का जो गर कभी अहसास करते तुम ।
--------अनिल उपहार ----
हमारी सीख का न इस तरह उपहास करते तुम ।
दिए हर बार तुमने ज़ख्म हँस कर सह लिए हमने
हमारे दर्द का जो गर कभी अहसास करते तुम ।
--------अनिल उपहार ----
Friday, March 27, 2015
ओ दरिंदो(कविता)
ओ इंसानियत के दरिंदों
अमन के दुश्मनों
मज़हब को जेहाद का
ज़ामा पहनाने वालों
मासूमों के खून में
कलम डुबोकर
अपनी माँ कों
ख़त लिखना ।
कि माँ
हमने अपने कृत्यों से
आज तेरी कोख़ कों
दुनियां में शौहरत दिला
तेरे दूध कों
शर्मसार कर दिया ।
उग्रवाद की ज़मीन पर
आतंक के बीज बोने वालों
शायद तुम नहीं जानते -
कि
जिन बस्तों कों तुमने
अपनी गोलियों का निशाना
बनाया
उस बस्ते का एक भी अक्षर
अगर बिखर गया
तो शब्दों की गूंज
तुम्हारी गोलियों की गूंज को
नेस्त नाबुत कर देगी ।
पर तुम्हें इससे क्या ?
तुमको कहाँ अंदाज़ा ?
पूछो उस माँ से
जो अब कभी
टिफिन नही बांधेगी ।
पूछो उन बूढी आँखों से
जो उनसे लिपट कर कहेगी
कि बाबा हम स्कूल से लौट आये ।
सजे धजे ये कोमल
मासूम से बच्चे
जिन्हें पलने में होना था
तुमने
ताबूत कैसे दे दिया ????????
---------अनिल उपहार -------
अमन के दुश्मनों
मज़हब को जेहाद का
ज़ामा पहनाने वालों
मासूमों के खून में
कलम डुबोकर
अपनी माँ कों
ख़त लिखना ।
कि माँ
हमने अपने कृत्यों से
आज तेरी कोख़ कों
दुनियां में शौहरत दिला
तेरे दूध कों
शर्मसार कर दिया ।
उग्रवाद की ज़मीन पर
आतंक के बीज बोने वालों
शायद तुम नहीं जानते -
कि
जिन बस्तों कों तुमने
अपनी गोलियों का निशाना
बनाया
उस बस्ते का एक भी अक्षर
अगर बिखर गया
तो शब्दों की गूंज
तुम्हारी गोलियों की गूंज को
नेस्त नाबुत कर देगी ।
पर तुम्हें इससे क्या ?
तुमको कहाँ अंदाज़ा ?
पूछो उस माँ से
जो अब कभी
टिफिन नही बांधेगी ।
पूछो उन बूढी आँखों से
जो उनसे लिपट कर कहेगी
कि बाबा हम स्कूल से लौट आये ।
सजे धजे ये कोमल
मासूम से बच्चे
जिन्हें पलने में होना था
तुमने
ताबूत कैसे दे दिया ????????
---------अनिल उपहार -------
मुक्तक (देखलो ये चाँद तारे)
थी सुहानी सुबह जीवन की वही अब दोपहर है ।
गिरती हुयी दीवार यारों थामना अब बेअसर है ।
दी ज़माने को चूनौती हर कदम हमने ,तभी तो
देखलो ये चाँद तारे अब भी मेरे हम सफ़र है ।
---------अनिल उपहार ------
गिरती हुयी दीवार यारों थामना अब बेअसर है ।
दी ज़माने को चूनौती हर कदम हमने ,तभी तो
देखलो ये चाँद तारे अब भी मेरे हम सफ़र है ।
---------अनिल उपहार ------
परिवर्तन के नये क्षितिज पर समृद्धि का सूर्य उदय हो ।
नया वर्ष मंगल मय सबको नया वर्ष मंगल मय हो ।
कण कण महक उठे धरती का तन मन पुलकित हो जगती का ।
चिर आभाव से शापित जीवन को वरदान मिले मुक्ति का ।
शस्य श्यामला भारत माता अभय अखंड अजेय हो ।
नया वर्ष मंगल मय सबको नया वर्ष मंगल मय हो ।
------अनिल उपहार ------
नया वर्ष मंगल मय सबको नया वर्ष मंगल मय हो ।
कण कण महक उठे धरती का तन मन पुलकित हो जगती का ।
चिर आभाव से शापित जीवन को वरदान मिले मुक्ति का ।
शस्य श्यामला भारत माता अभय अखंड अजेय हो ।
नया वर्ष मंगल मय सबको नया वर्ष मंगल मय हो ।
------अनिल उपहार ------
पतंगे (मकर सक्रांति)
जीवन में विश्वास जगाती ।
देखो उडती आज पतंगें।
सदभावों के गीत सुनाती ।
देखो उडती आज पतंगें ।
अंधकार हारेगा निश्चित ।
जुगनुओं में होड़ लगी है ।
सूरज से बतियाती लगती ।
देखो उडती आज पतंगें ।
नहीं परिंदा कोई फसेगा ।
नफरत की इस डोर में ।
जियो और जीनेदो सबकों ।
कहती उडती आज पतंगें ।
मकर सक्रांति की हार्दिक शुभ कामनाये ।
---------अनिल उपहार ------
देखो उडती आज पतंगें।
सदभावों के गीत सुनाती ।
देखो उडती आज पतंगें ।
अंधकार हारेगा निश्चित ।
जुगनुओं में होड़ लगी है ।
सूरज से बतियाती लगती ।
देखो उडती आज पतंगें ।
नहीं परिंदा कोई फसेगा ।
नफरत की इस डोर में ।
जियो और जीनेदो सबकों ।
कहती उडती आज पतंगें ।
मकर सक्रांति की हार्दिक शुभ कामनाये ।
---------अनिल उपहार ------
-----शायद तुम लौट आओ ------
----------------------------
मन का मरुस्थली सन्नाटा तोडती
तुम्हारी यादें
घोल देती थी
देह की हर दस्तक में मिठास ।
पलकों पर सजे सिंदूरी स्वप्न ।
बार बार देते निमंत्रण
मन देहरी पर
भावनाओं के
अक्षत चढाने कों ।
संस्कारों की सड़क के मुसाफिर सा
तुम्हारा बेखोफ चलना ।
तहजीब की ग्रंथावली के
कोमल किरदार को
सलीके से निभाना ।
पढ़ा देना बातों ही बातों में
मर्यादा का पाठ ।
विरदा वलियों का संवाद ।
जिसने रिश्तों के रंग मंच पर
अपना अभिनय
बखूबी करना सिखाया ।
अचानक-
वक़्त की आई तेज आंधी ने
सब कुछ
बिखेर कर रख दिया ।
और धूल धुसरित कर दिया
उन सभी रिश्तों कों ,
जिनकी छाँव में
हमने जीवन के सतरंगी सपनों को
बुना था ।
कहने कों अब नहीं हो
साथ मेरे ।
पर आज भी अहसास ज़िन्दा है
मन के किसी कोने में ।
तुम्हारा शांत नदी सा बहना ।
लहरों सा अठ खेलियाँ करना ।
और
अचानक छोड़ कर चल देना ।
मेरे गीत और छंद सूने है
तुम्हारे बगेर ।
फिर भी विश्वास है कि -
तुम लौट आओगे
और
अधरों पर गीत बन
बिखेर दोगे
अपने माधुर्य की ताज़गी ।
मै अपने गीत और छंद
तुम्हारे नाम करता हूँ ।
श्रध्दा की पावन प्रतिमा
मै तुम्हें प्रणाम करता हूँ ।
--------अनिल उपहार -------
----------------------------
मन का मरुस्थली सन्नाटा तोडती
तुम्हारी यादें
घोल देती थी
देह की हर दस्तक में मिठास ।
पलकों पर सजे सिंदूरी स्वप्न ।
बार बार देते निमंत्रण
मन देहरी पर
भावनाओं के
अक्षत चढाने कों ।
संस्कारों की सड़क के मुसाफिर सा
तुम्हारा बेखोफ चलना ।
तहजीब की ग्रंथावली के
कोमल किरदार को
सलीके से निभाना ।
पढ़ा देना बातों ही बातों में
मर्यादा का पाठ ।
विरदा वलियों का संवाद ।
जिसने रिश्तों के रंग मंच पर
अपना अभिनय
बखूबी करना सिखाया ।
अचानक-
वक़्त की आई तेज आंधी ने
सब कुछ
बिखेर कर रख दिया ।
और धूल धुसरित कर दिया
उन सभी रिश्तों कों ,
जिनकी छाँव में
हमने जीवन के सतरंगी सपनों को
बुना था ।
कहने कों अब नहीं हो
साथ मेरे ।
पर आज भी अहसास ज़िन्दा है
मन के किसी कोने में ।
तुम्हारा शांत नदी सा बहना ।
लहरों सा अठ खेलियाँ करना ।
और
अचानक छोड़ कर चल देना ।
मेरे गीत और छंद सूने है
तुम्हारे बगेर ।
फिर भी विश्वास है कि -
तुम लौट आओगे
और
अधरों पर गीत बन
बिखेर दोगे
अपने माधुर्य की ताज़गी ।
मै अपने गीत और छंद
तुम्हारे नाम करता हूँ ।
श्रध्दा की पावन प्रतिमा
मै तुम्हें प्रणाम करता हूँ ।
--------अनिल उपहार -------
चिठ्ठी में (मुक्तक)
कुछ अपनों का नाम लिखा है चिठ्ठी में ।
जीवन है संग्राम लिखा है चिठ्ठी में ।
गैर को उसने अपना माना भूल हुयी
ये भी इक पैगाम लिखा है चिठ्ठी में ।
----------अनिल उपहार -----
जीवन है संग्राम लिखा है चिठ्ठी में ।
गैर को उसने अपना माना भूल हुयी
ये भी इक पैगाम लिखा है चिठ्ठी में ।
----------अनिल उपहार -----
आज हमारी माताजी की पुण्य तिथि है जो आज ही के दिन अपनी अनंत यात्रा पर प्रस्थान कर गयी थी ।उन्हीं को समर्पित कुछ शब्द सुमन ।।।।।।
-------माँ------------
तुमने संस्कारों के बीज रोप
संघर्षों के झंझावात और
असहनीय पीड़ा को भोगते हुए
लगाया था जो बिरवा ,
आज पल्लवित और पुष्पित होते देख
मन ही मन प्रसन्न होती थी तुम ।
हे माँ !
तुम्हारी रिक्तता अब नही भर पायेगी
मन के सूने पन कों ।
उदासी और संस्कारों के स्पंदन को ।
लेकिन तुम्हारी दुआओ के दीप जगमगाएंगे ,
रोशन करेंगे सूनी राहों को ,
प्रकाशित करेंगे ,उदास हवाओं को ।
काश ! मै समझ पाता माँ होने की परिभाषा
और लिख पाता एक महाकाव्य तुम पर
मेरे गीत और छंद पुकारते है तुमको
लेकिन मै जानता हूँ कि तुम कभी नहीं लौटोगी उस यात्रा से
हे ! ममतामयी ,देवी स्वरूपा,
वात्सल्य मूर्ति माँ !तुम्हें अनंत प्रणाम ।।
--------अनिल उपहार -----
-------माँ------------
तुमने संस्कारों के बीज रोप
संघर्षों के झंझावात और
असहनीय पीड़ा को भोगते हुए
लगाया था जो बिरवा ,
आज पल्लवित और पुष्पित होते देख
मन ही मन प्रसन्न होती थी तुम ।
हे माँ !
तुम्हारी रिक्तता अब नही भर पायेगी
मन के सूने पन कों ।
उदासी और संस्कारों के स्पंदन को ।
लेकिन तुम्हारी दुआओ के दीप जगमगाएंगे ,
रोशन करेंगे सूनी राहों को ,
प्रकाशित करेंगे ,उदास हवाओं को ।
काश ! मै समझ पाता माँ होने की परिभाषा
और लिख पाता एक महाकाव्य तुम पर
मेरे गीत और छंद पुकारते है तुमको
लेकिन मै जानता हूँ कि तुम कभी नहीं लौटोगी उस यात्रा से
हे ! ममतामयी ,देवी स्वरूपा,
वात्सल्य मूर्ति माँ !तुम्हें अनंत प्रणाम ।।
--------अनिल उपहार -----
मुक्तक
चले गर वक़्त की आंधी संभलना मत उछल जाना।
कहीं तुम देखकर रंगी नजारे मत मचल जाना।
न डरना तुम ज़माने की बदलती इन फिजाओं से।
भले बदले यहाँ मौसम मगर तुम मत बदल जाना ।
-------अनिल उपहार ------
कहीं तुम देखकर रंगी नजारे मत मचल जाना।
न डरना तुम ज़माने की बदलती इन फिजाओं से।
भले बदले यहाँ मौसम मगर तुम मत बदल जाना ।
-------अनिल उपहार ------
Wednesday, March 25, 2015
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