इक प्रणय गीत है एक प्रणय छंद है ।
तन से तन को मिली जो मधुर गंध है ।
देखा बासंती मन तो नयन कह उठे
प्यास का तृप्ति से आज अनुबंध है ।
अनिल जैन उपहार
इक प्रणय गीत है एक प्रणय छंद है ।
तन से तन को मिली जो मधुर गंध है ।
देखा बासंती मन तो नयन कह उठे
प्यास का तृप्ति से आज अनुबंध है ।
अनिल जैन उपहार
माना कि ज़िंदगी की दौड़ में बढ़ गए हो तुम ।
और शोहरत की ऊंचाई चढ़ गए हो तुम ।
माँ बाप की खिदमत का सबक सीखा नही तुमने
कैसे मान लें कि सारे सबक पढ़ गए हो तुम ।
अनिल उपहार
संवेदना के आईने में
नही उभरता
अब कोई अक्स
अपनेपन का ,
शब्दों के रुमाल
झाड़ने लगते है
स्वार्थ की महीन
धूल ।
गरीब होती
वैचारिक सम्पदा
अस्तित्व खोते
संस्कार युक्त वैभव ने
लिख दिया है लेखा जोखा
समय के भाल पर ।
इतिहास लिखेगा
वृतांत
कर्मो की स्याही से ,
तब नही होगा सामर्थ्य
बांचने का ,
पथराई आंखों में ।।।।
#अनिल जैन उपहार
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मेरी यादों की कश्ती में वो दुनियाँ घूम लेता है ।
गुज़ारे साथ जो लम्हे उन्ही पर झूम लेता है ।
छुआ जिस दिन उसे मैंने तो सुध बुध भूल बैठा वो
आईना सामने रख कर के खुद को चूम लेता है ।
#@कॉपीराइट अनिल उपहार
किसी की याद में शामो सहर,
तपना लिखा होगा |
उनींदी आँख को उसने हँसी,
सपना लिखा होगा |
मेरा होकर भी जो मेरा ,कभी
भी हो नही पाया |
मुकद्दर में नही शायद मिलन,
अपना लिखा होगा |
अनिल उपहार
संवेदना के आईने में
नही उभरता
अब कोई अक्स
अपनेपन का ,
शब्दों के रुमाल
झाड़ने लगते है
स्वार्थ की महीन
धूल ।
गरीब होती
वैचारिक सम्पदा
अस्तित्व खोते
संस्कार युक्त वैभव ने
लिख दिया है लेखा जोखा
समय के भाल पर ।
इतिहास लिखेगा
वृतांत
कर्मो की स्याही से ,
तब नही होगा सामर्थ्य
बांचने का ,
पथराई आंखों में ।।।।
#अनिल जैन उपहार
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