Thursday, December 16, 2021

हम दोनों भाई।।।।।।।

पूरा परिवार गुड़िया की हल्दी की रस्म

जीवेश की हल्दी की रस्म

दादाजी आशीर्वाद देते हुए।

जीवेश अपने दादाजी से आशीर्वाद लेते हुए।

जीवेश और रौनक अपने नाना के साथ

उल्लास के पल परिवार के साथ

गुड़िया को हल्दी लगाता भाई जीवेश

बिटिया अपनी सहेलियों के साथ

दूल्हा बना बेटा अपनी प्यारी बहन के साथ

बिटिया की हल्दी की रस्म

समाचारों में वर्ड बुक ऑफ रिकॉर्ड

वर्ड बुक रिकार्ड का प्रमाणपत्र हुआ प्राप्त

राजस्थान पत्रिका की खबर

वर्ड बुक रिकॉर्ड की मीडिया न्यूज़

Thursday, September 30, 2021

मुक्तक(सिर्फ तुम)

जब जब मैं लिखने बैठू, तुम आकर लिखवा जाते हो।

मेरे मौन स्वरों को अपने मीठे स्वर दे जाते हो ।

गीत तुम्हारे शब्द तुम्हारे मैं तो वाचक अदना सा,

कौन हो तुम हर वक़्त हृदय की सारी पीड़ा हर जाते हो।

डॉ अनिल जैन उपहार

Monday, September 13, 2021

हिंदी दिवस पर(मुक्तक)

हिंदी दिवस की शुभकामनाए।

अभिव्यक्ति का शिखर कलश है, भावों की  वन्दनवार है हिंदी।
भारत के भाल का चंदन, नेह भरा उपहार है हिंदी।
अलंकार सुशोभित जिससे राष्ट्र का स्वाभिमान है हिंदी
संस्कृति की उन्नायक है, भाषा का तोरण द्वार है हिंदी।

डॉ अनिल जैन उपहार

Tuesday, September 7, 2021

मुक्तक(तुमसे ही पाया है ।)

ज़हन में हर घड़ी मेरे ,तेरी यादों का साया है ।
मगर तू है नही मेरा,नहीं लगता पराया है ।
किसी की आंख का आँसू चुरा पलकों पे रख लेना,
मुहोब्बत का यही लहज़ा तो मैने तुमसे पाया है ।

डॉ अनिल जैन उपहार#कॉपीराइट

Tuesday, August 31, 2021

मुक्तक(संशोधि)

जिंदगी जंग है तो जंग लड़ेंगे हम भी।

रिक्त जीवन में  कई रंग भरेंगे हम भी

किसी बंधन में बंधे हों  ये जरूरी तो नहीं 

राह कैसी भी हो पर संग चलेंगे हम भी ।

डॉ अनिल जैन उपहार

Monday, August 30, 2021

(जिंदगी)मुक्तक

जिंदगी जंग है तो जंग लड़ेंगे हम भी।
मन की कुंची से कई रंग भरेंगे हम भी।
ये जरूरी तो नही रिश्तों में बेमानी हो
राह कैसी भी हो पर संग चलेंगे हम भी ।

डॉ अनिल जैन उपहार

Wednesday, August 18, 2021

गीत (गीत गुनगुना रहा हूँ)

गीत गुनगुना रहा हूँ गीत बन के आइये।
देहरी पे फिर कोई नवगीत छेड़ जाइये।

मुक्तकों से है नयन छंद सजे अधरों पर।
गेसुओं पे सज रही घनाक्षरी भी झूम कर।
लक्षणा अभिधा जैसा रूप ओढ़ आइये
व्यंजना से स्वर मिले वो काफिया सजाइये।

गुरु लघु सा चित्र लिए रेखाए बता रही।
लय और ताल सी गति ह्रदय पटल पे छा रही।
दोहों और चौपाइयां सी तान लेके आइये।
पायलों की वो मधुर झनकार ले के आइये।

आभा स्वर्ण रश्मियों ने जो रखी कपोल पर।
गीतिका सी लग रही दो पाँखुरी अधर पर।
भोएँ अनुबंध लिख रही थी स्वप्न आइये।
नयनों के अनुप्रास पर गीत तो रचाईये ।

डॉ अनिल जैन उपहार

Monday, August 16, 2021

आमंत्रित श्रोता और आयोजक परिवार

शानदार मंच संचालन

स्वतंत्रता दिवस की शाम

एक शाम वतन के नाम गीतांजलि होटल के शानदार सुसज्जित मंच पर झालरापाटन

गीतिका

 दिल कहता है गीत सुनाऊ आ तुझको मन का मीत बनाऊ।

रिश्तों का उपमान बदलकर अलंकार से रीत बनाऊ।

माना छंद बना है जीवन चलन ज़माने का गहरा है।

आस अधूरी रही मिलन की उम्मीदों पर भी पहरा है।

मन देहरी पर अक्षत धर कर खूब करू मनुहार मनाऊ।

हृदय पटल पर शब्द धरु में सचमुच ऐसी प्रीत निभाऊं।

मन से मन का मिलन करा दे ऐसा कोई गीत सुनाऊ।


दर्द भी चुप अधरों से बोले नयनों के सब मौन इशारे।

कैसे कब तक राह निहारे ये सावन की मस्त फुहारें ।

आजाओ अब नेह पुकारे तुझको मितवा मीत पुकारे।

छंद तुम्ही नवगीत तुम्ही तुमसे ही हर बन्ध सजा रे।


डॉ अनिल जैन उपहार

मितवा(गीतिका)

दिल कहता है गीत सुनाऊ आ तुझको मन का मीत बनाऊ।
रिश्तों का उपमान बदलकर अलंकार से रीत बनाऊ।
माना छंद बना है जीवन चलन ज़माने का गहरा है।
आस अधूरी रही मिलन की उम्मीदों पर भी पहरा है।
मन देहरी पर अक्षत धर कर खूब करू मनुहार मनाऊ।
हृदय पटल पर शब्द धरु में सचमुच ऐसी प्रीत निभाऊं।
मन से मन का मिलन करा दे ऐसा कोई गीत सुनाऊ।

दर्द भी चुप अधरों से बोले नयनों के सब मौन इशारे।
कैसे कब तक राह निहारे ये सावन की मस्त फुहारें ।
आजाओ अब नेह पुकारे तुझको मितवा मीत पुकारे।
छंद तुम्ही नवगीत तुम्ही तुमसे ही हर बन्ध सजा रे।

डॉ अनिल जैन उपहार

Saturday, August 7, 2021

मित्रता दिवस(मुक्तक)

महक जाये धरा मन की मैं ऐसा इत्र लाया हूँ ।

अदब और संस्कारों से सजा वो चित्र लाया हूँ ।

डिगा सकते नही जिसको चलन भी दोगलाई के 

रखे महफूज़ दिल में राज़ ऐसे मित्र लाया हूँ ।

अनिल उपहार

Tuesday, July 27, 2021

प्रभाव(मुक्तक)

ज़िन्दगी तूने दिखाए वो सपन देख लिए।

फरेबी दुनियां में अपनों के चलन देख लिए।

यहाँ घुलता हुआ रिश्तों में ज़हर देखा है,

अर्थ की दौड़ में लाशो के कफ़न देख लिए।

डॉ अनिल जैन उपहार

Saturday, July 24, 2021

लहज़ा (कविता)

ये जो तुम्हारे सख्त लहज़े की 
तहरीर  है न 
बड़ा नर्म अहसास 
कराती है 
पथराई आंखों को ।
शायद इन्ही में गुम तो 
नहीं 
हौसलो के पर 
जो खींच लाये है 
तुम्हे धरती से 
आसमा पर ।

अनिल जैन उपहार

Saturday, July 17, 2021

मुक्तक(लालसा)

मन हुआ छोटा बहुत पर कामना मरती नही ।

तन भले ही साथ ना दे वासना मरती नहीं ।

 सांस जब अपनी नही  किस बात का गुमान फिर 

धन बहुत है पास लेकिन लालसा मरती नहीं ।

अनिल उपहार

Friday, July 9, 2021

गीतिका (तू ही मधुर साज है)

लेखनी बेबस जुबा खामोश है 
कैसे कहदूँ कि तू मेरे पास है ।
बिन तेरे कुछ और भाता नहीं
तू है कि लौट कर आता नहीं ।
छंद का अनुप्रास हो तुम
गीत का आगाज़ हो तुम।
ग़ज़ल का उनवान भी तुम
साहित्य का दिनमान भी तुम।
व्याकरण हो तुम ही रस्मों रीत का
हो सुखद अहसास पहली प्रीत का।
फिर भी तेरे होने का हर घड़ी अहसास है 
गीत भी तू ही मेरा ,तू ही मधुर आवाज़ है।

डॉ अनिल जैन उपहार (कॉपीराइट)

Thursday, July 1, 2021

मुक्तक

टूटकर जो गिरा उसको भी सहारा देना।
भूले राही को उम्मीदों का किनारा देना।
ये अभावों का सफर पीछे छूट जाएगा
मन के हारे को उमंगो का सितारा देना।

डॉ अनिल जैन उपहार

Tuesday, June 15, 2021

मुक्तक(श्रंगार)

कभी मिलने ओ मिलाने की ही सूरत लिखना ।

लौट के आओगे इक दिन वो मुहूरत लिखना ।

 पढ़ सकूं ख़त कि वो बातेँ जो मिटा दी तुमने।

गर लिखो अबके तो बस  ऐसी  इबारत लिखना ।

--------डॉ अनिल जैन उपहार कॉपीराइट --------

Saturday, June 5, 2021

मुक्तक(विश्व पर्यावरण दिवस)

विश्व पर्यावरण दिवस पर

खूब दिया हमने न सहेजा सांसे तक लाचार दिखी।

प्रकृति की अन देखी की तो सांसे खुद बाज़ार बिकी।

जंगल सारे काट दिये जब भौतिक सुख की आशा में

छोटे से एक कीट ने आकर इंसानी औकात लिखी।

डॉ अनिल जैन उपहार

Thursday, May 27, 2021

काहे रोना(मुक्तक)

लग गया विराम है कुछ पल का, ना विचलित हमको होना है।

फल पड़े भोगना कर्मों का,यह तो निश्चित ही ढोना है।

शुभ अशुभ राग के गलियारे सब तरफ स्वप्न गर बिखरे हों

जब जीत हार सब अपनी है फिर काहे रोना धोना है।

डॉ अनिल जैन उपहार

Saturday, May 22, 2021

मुक्तक (समर्पण)

मौन का व्याकरण मौन पढ़ता रहा।
कौन उपमान आकर यूं गढ़ता रहा।
छंद प्रतिमान खुद ही बदलने लगे
आचमन प्रेम का प्रेम जढ़ता रहा।

डॉ अनिल जैन उपहार

Tuesday, May 18, 2021

कोरोना

जो मिला  हँस कर जिये ये पुण्य के आधीन है।

कर्म गर खोटे किये तो जिंदगी गमगीन है ।

हो महामारी कोई या आपदा की हो घड़ी

वो रहे हर हाल में ख़ुश जो  रहे निज  लीन है।

डॉ अनिल जैन उपहार

Monday, April 26, 2021

भरोसा टूटने न दे( कविता)

बस भरोसा न टूटे
,,,,,,,,,,,,,,,,,,
साय साय करती सड़कें
सुनसान पड़े चौराहे,
दूर रह कर जीने की विवशता
सिर्फ कुछ दिनों की परीक्षा है।
परीक्षा है हमारे सब्र की ,
हमारे अंदर बैठी करुणा की।

तो क्यों न ,
थोड़ा एकांत से प्यार करें
घर मे रहकर अपनों से अपनो सा व्यवहार करें,
बेजान हुए रिश्तों में नई जान डाल दे
धूल खाती किताबो की 
थोड़ी धूल झाड़ दे।

वो दिन दूर नही हम फिर से 
हाथों में हाथ ले
गाएंगे प्रेम के तराने।
यात्रा में बेखोफ करेंगे
एक दूजे के साथ  जी भर कर संवाद।
बस थोड़ा सा संयम रख लें

रखले मन मे धीरज
की कुछ भी होजाए
हम सूखने नही देंगे संवेदना की सियाही,
टूटने नही देंगे सब्र का बांध।
फिर सूरज निकलेगा
फिर पंछी करेंगे कलरव
और हम जियेंगे ज़िंदगी
पहले की तरह।

बस कुछ दिन 
आदत डाल लें घर मे रहने की,
कि बेजुबान भी कह उठे
ये आदमी कमबख्त अपनी पर आजाए तो हरा सकता है 
हर महामारी।

डॉ अनिल जैन उपहार

Sunday, April 25, 2021

कोरोना से डरे नही

माना घोर अंधेरी राते, और उजाले कैद हुए।
सूरज संग जुगनू भी सारे लगता है संवेद हुए।

हिम्मत ना टूटे कोई सब आयु कर्म के बन्धन है
आशाओ के दीप जले उम्मीदों से अनुबंधन है।

वक्त बीत जायेगा ये भी बस मन मे विश्वास रखें
कर्मो का लेखा जोखा है इतना सा आभास रखे।

सूरज फिर निकलेगा देखो सब मिल कर यह जतन करें।
पहले भय को दफ़न करें और मानवता को नमन करें।

डॉ अनिल जैन उपहार

Sunday, April 18, 2021

(कोरोना )डरो नही हिम्मत रखो

महामारी गर उग्र हुई तो सब्र हमें करना होगा।
घर मे रह कर चंद दिनों तक खुद को खुद में रखना होगा।
स्वास्थ्य यदि बचा लेंगे तो जीवन खुशहाल बनेगा ही,
तम हारेगा तय है इतना अंधकार भागेगा ही।
इम्तहान की घड़ी आज सबको खरा उतरना है
विश्वास टूटने मत देना बस प्रलय के पंख कुतरना है।
हम फिरसे सशक्त बनेंगे तब चेन तोड़ यह पाएंगे।
कोरोना क्या चीज़ बड़ी हिम्मत से इसे हराएंगे।

डॉ अनिल जैन उपहार

Monday, April 12, 2021

कविता (भावांजलि)गुरुवर विमर्श सागर जी के श्री चरणों में

आचार्य विमर्श सागर जी के चरणों में,,,,,,

आगम निष्ठ तपस्वी वाणी रागद्वेष कल्मष धोती।
'समर्पण के स्वर' संग गूथे "मानतुंग "के अनुपम मोती।'गूंगी चीख' 'वन्दनीय गुरुवर' 'शंका की एक रात'।
'सोचता हूँ कभी कभी' मैं पाऊँ नित्य गुरु आशीर्वाद।
विमार्शनजली,गीतांजलि,वीरागा जंलि क्या खूब कही।
जीवन पानी की बूंद है भैया जीवन चलती हुई घड़ी।
'खूबसूरत लाइने' जाहिद की गज़ले गाती है।
शुद्धात्म साधक कलम योद्धा का चिंतन दर्शाती है ।
है शब्द चितेरे ,कलम धनी,श्रद्धा से करता अभिनंदन
उपहार का पावन चरणों मे स्वीकार करो शत शत वन्दन।

डॉ अनिल जैन उपहार

जिनके चिंतन में झलक रही इस नश्वर जग की नश्वरता।
जिनकी निर्मल वाणी में अमृत का झरना ही झरता।
जिनके पावन दर्शन पाकर आल्हादित होते है भविजन
उन परम पूज्य निर्ग्रन्थ गुरु के चरणों मे शत शत वन्दन।

जिनके पावन श्री मुख से अमृत की निर्झरणी झरती।
जिनके चरण कमल की रज भव तापों की ज्वाला हरती।
तत्वज्ञान से महिमा मंडित है जिनका मौलिक चिंतन,
उन परम पूज्य विमर्श गुरु के चरणों मे शत शत वन्दन।

डॉ अनिल जैन उपहार

Tuesday, April 6, 2021

प्रतीक (कविता)

बातों ही बातों में अक्सर
तुम मुझमे खोने लगते हो।
बीच भंवर में अल्फाज़ो के
भ्रमर जाल बोने लगते हो।

अनुत्तरित से रहे सदा जो
वो सारे प्रश्नों के हल भी
समाधान की बाट जोहते
थक कर सोने चले गए है।

कौन घड़ी किस पल पर ठहरे
स्वप्न खुद ही से छले गए है।

अलसाये पन्नो के सच मे 
अश्रु जल धोने लगते हो।

डॉ अनिल जैन उपहार

Tuesday, March 2, 2021

मुक्तक

कैसा दस्तूर है ये कैसा चलन आया है ।
बदलते दौर ने खोया भी बहुत पाया है ।
है  परिंदों के सर पे आसमा की चादर पर
लगा पंखों पे क्यूँ दहशत का घना साया है।

डॉ अनिल जैन उपहार

Thursday, February 25, 2021

मुक्तक (फागुनी रंग)

भाव उदघोषित हो मन के नेह के निर्झर झरे।
तन बासन्ती फ़ाग गाए व्यंजना खुद रंग भरे।
देह निर्मित चंदनों से नित नए परिधान लौटे
गीत फिर अधरों पे आए मिलन की पुष्टि करे।

डॉ अनिल जैन उपहार

Monday, February 1, 2021

कविता (मन)

सुलगते सवालों पर 
उपहास का मरहम
उन्नत और व्याकुल
प्रश्नों के अर्थ खोते
समाधान के छितराए बादल
खोल देते है पीड़ा के बंद द्वार
हर बार छला जाता है मन।

आभासी दुनियां में गुम होती
अपने पन की निश्च्छल हँसी
भाने लगता है धुंधलका
और खो जाता है बरसों का
सहेजा हुआ प्यार।
अजीब रवायत है न 
इस संसार की,
कब लौटेगा आदमी
अनजान सफर से
अपने बिखरते हुए
स्मृति के कच्चे मकान में।

डॉ अनिल जैन उपहार

Sunday, January 17, 2021

मन देहरी(मुक्तक)

अंतस की इस ऊहा पोह में कैसे दस्तक द्वार लगाऊँ ।

रूठ गयी अब मन की देहरी कैसे वंदनवार सजाऊँ ।

स्मृति  के अलसाये पन्ने और व्याकरण भी गहरा है

शब्दकोष भी विवश बहुत है अब कैसे प्रतिमान जुटाउँ ।

-------डॉ-अनिल उपहार -----

Thursday, January 14, 2021

अभागन कविता

अभागन
,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

सारी उपमाएं और
उपमान 
थोते थे 
उसके सामने ,
संघर्ष सदैव 
गलबहियां कर
उकसाते और
लेते थे इम्तहान उसका ,
मगर हर परीक्षा में 
अव्वल आने की ज़िद सी थी
उसके स्वभाव में ,
प्रतिकूलता की खाई
रोक नही पाती थी 
उसके अटल इरादों को ।
शायद सीख लिया था
उसने ,बदचलनी हवाओं से
संभलकर चलना,
इल्ज़ामों की
 लंबी फेहरिस्तके बीच ।

अनिल जैन उपहार

Thursday, January 7, 2021

मुक्तक असर (ज़िंदा है )

उसके लहजे में अदब और असर भी जिंदा है ।
उसके अहसास में शामिल वो सफर ज़िंदा है ।
जिसकी हर बात में मिश्री सी घुली लगती है 
उसके अल्फ़ाज़ में उल्फत का शहर ज़िंदा है ।

डॉ अनिल जैन उपहार