Sunday, December 25, 2016

Uski गली

उसकी गली से जब भी गुजरना पड़ता है ।

तूफानों की ज़द से गुज़रना पड़ता है ।

ज़ख्म सभी ताज़ा है अब तक सीने में

अरमानों को रोज़ निगलना पड़ता है ।

अनिल उपहार

Saturday, December 24, 2016

रूप की धूप

रूप की धूप कहें या भीगे हुए जज़्बात कहें ।
सूरज से नज़र मिलाती हँसी मुलाकात कहें ।
गहनता है संस्कारों की अधरों से बयाँ होती है
रुबाई मीर की कहदें या खुदा की करामात कहें ।
अनिल उपहार

Thursday, December 22, 2016

सीख ।।।।।।।।

माना तुमको मज़हब से भी ,ज्यादा प्यारा प्यार रहा ।

भौतिकता की चकाचौंध में , बस तेरा कारोबार रहा ।

पुरखों की विरासत का भी ,मान नही रख पाई तुम

अपनी शोहरत की भी सच में ,लाज नही रख पाई तुम

नाम भले ही कैसा भी हो ,कर्म याद कर लेना था ।

जिसने तुमको मान दिया ,सम्मान याद रख लेना था ।

अनिल उपहार

Saturday, December 17, 2016

संबंधो के गुलमोहर

तुम चाहते थे
प्रकाश की मानिंद
आधुनिकता को ओढ़ लेना ।

और मैं
परम्परा को धरती की तरह
बिछाता रहा ।

चुभने लगी
घोर अभावों की सुइयां

संबंधो के गुलमोहर
रोज़ खिलते थे
आश्वासनों के गमलो में ।

कोई किरदार फिर हो उठता
जीवंत
समेटने लगता निश्चलता के
बिखरे पन्नों को ।

और उम्मीदों की चौखट ,
गहरी संवेदना को
पढ़ती रहती
प्राक्कथन की तरह ।

अनिल उपहार

Monday, December 12, 2016

मुक्तक

अनछुए सब पहलुओं का वो बड़ा फनकार क्यूँ है ।

है बहुत कमसिन मगर खामोश सा किरदार क्यूँ है ।

इन वफाओं का चलन भी खो गया तन्हाइयों में

सब देखकर के यूं लगा ये ज़िन्दगी दुश्वार क्यूँ है ।

अनिल जैन उपहार

Saturday, December 10, 2016

कविता

अपलक निहारती
क्षितिज के उस पार
बीते हुए साल की
सहेजी हुई यादों कों
खामोशियों की पगडंडी ।

शीत में उष्णता का
अहसास कराती
तेरे चुपचाप चले जाने की वज़ह ।

और मैं
नन्हें से किरदार की तरह
रिश्तों के रंगमंच पर
कर रहा होता हूँ
मिलन के अदभुत पलों का
जिवंत अभिनय ।

अनिल जैन उपहार

मुक्तक

गुज़रे लम्हों के साये में बैठे मन में आंच लिए ।

ख़त तुमने लिक्खे थे जो भी अक्षर अक्षर बांच लिए ।

धुंधली होगई सारी लिखाई और स्याही भी थी फीकी

नज़रों ने सारे ही उत्तर एक पल में ही जांच लिए ।

अनिल जैन उपहार