इंसानियत की अंगूठी में
पवित्रता का मोती है प्रेम।
आज कल न जाने क्यूं
द्वार देहरी से रूठा हुआ
अलगाव की भाषा बोल
देहरी के दीप को
चिढ़ाने लगा है।
सादगी की वीणा पर,
सृजन, सात्विकता के संगीत को छोड़
विरह के गीत गाने लगा है,
मर्यादा का शिखर
अपने अस्तित्व को बचाने के
सारे प्रयास धूमिल कर चुका है
ऐसे में फिर भी उम्मीद की
सियाही
लिख रही है संदेश
अपनी प्रेयसी के नाम।
डा अनिल जैन उपहार