Friday, August 28, 2020

पिंजरा (कविता)

विषय ----पिंजरा

हर बार कैद कर दिया गया फ़ज़ीहत के पिंजरे में
कभी आत्म सम्मान की कीमत पर
तो कभी अपने हुनर के दम पर
कब तक देता रहूंगा दलील
तुम्हारी अदालत में 
कभी विवशता की आंधी में गुम हो जाती है
मेरी बेगुनाही
आखिर कब होगी रिहाई
तुम्हारी रूढ़िवादी इन
तकरीरों के सामने
हर बार होता रहा हूँ
बेबस और लाचार।
ये दकियानूसी का पिंजरा
आखिर क्यों नही होने देता रिहा।
तुम समझ रहे हो न
मैं पहले भी तुम्हारे साथ था 
आज भी खड़ा हूँ 
प्रतीक्षा में कि
तुम आओगे और कर दोगे आज़ाद
सारी बंदिशों से ।

डॉ अनिल जैन उपहार

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