गीत -----
बादल घिर घिर आए
कोयल कुहू कुहू गाये
सजन तुम क्यो नही आए
विरह की आग जलाए।
ओ परदेसी साजन आजा रे अब आजा।
तुम बिन सूनी रतियाँ
संदेसा भिजवा जा।
पापी पपीहा रा गाए
सूनी सेज डराए ।
सजन तुम क्यो नही आए
विरह की आग जलाए।
सखिया संग संग झूले
सावन बीता जाए।
याद में तेरी बालम
आँखे भर भर आए।
आ के धीर बंधा जा
मेरी सेज सजा जा ।
सजन तुम क्यो नही आए।
विरह की आग जलाए।
ले चल सजना अबतो
बादल के उस गाँव।
साथ गुजारे पल हमने
पीपल की थी छाँव।
कोई गीत सुना जा
मोसे प्रीत निभाजा
सजन तुम क्यो नही आए
विरह की आग जलाए।
डॉ अनिल जैन उपहार
No comments:
Post a Comment