------इस बसंत -----
-----------------------
सांसो के मधुबन में अब भी
गीत कुंलाचे भरते रहते |
छंद और व्याकरणी पैमाने
नव सृजित अनुप्रास से बहते |
हर प्रतीक्षा आगमन की
राह सी दिखती रही |
द्वार आँगन देहरी संग
मधुमास पल लिखती रही |
धडकनों की पालकी से
हर बार मन तुमको निहारे |
गीत कविता छंद ही क्या
खुद गज़ल तुमको सँवारे |
नेह निमंत्रण तुमको है
नव गीत अधर पर तुम रख दो |
जीवन के रेखा चित्रों में
आकर बासंती रंग भरदो |
---------अनिल उपहार -----------
-----------------------
सांसो के मधुबन में अब भी
गीत कुंलाचे भरते रहते |
छंद और व्याकरणी पैमाने
नव सृजित अनुप्रास से बहते |
हर प्रतीक्षा आगमन की
राह सी दिखती रही |
द्वार आँगन देहरी संग
मधुमास पल लिखती रही |
धडकनों की पालकी से
हर बार मन तुमको निहारे |
गीत कविता छंद ही क्या
खुद गज़ल तुमको सँवारे |
नेह निमंत्रण तुमको है
नव गीत अधर पर तुम रख दो |
जीवन के रेखा चित्रों में
आकर बासंती रंग भरदो |
---------अनिल उपहार -----------
No comments:
Post a Comment