Sunday, July 10, 2016

मुक्तक (आज फिर से)

आज फिर से दुआओ में असर आया है ।

चाँद फिरसे मेरे आँगन में उतर आया है ।

पढ़ तो लेता मैं उसे शोख़ निगाहों से मगर

अक्स जैसे कोई आँखों में उभर आया है ।

अनिल उपहार

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