Friday, July 15, 2016

दोहे

अम्बर भी धोने लगा चरण धरा के आज ।

पावस का ख़त पढ़ चला खोल पपीहा साज ।

नित परिधान बदल रहा देखो बादल आज ।

बून्द बून्द ने छेड़ दिए मन के सारे साज ।

अनिल उपहार

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