महक जाये धरा मन की मैं ऐसा इत्र लाया हूँ ।
अदब और संस्कारों से सजा वो चित्र लाया हूँ ।
डिगा सकते नही जिसको चलन भी दोगलाई के
रखे महफूज़ दिल में राज़ ऐसे मित्र लाया हूँ ।
अनिल उपहार
No comments:
Post a Comment