सदा फांकों में रहके चाहतो के दिन उजाले थे ।
जुगाली करते सांसों की भले रूठे निवाले थे ।
लगा माथे से मिट्टी देश की सरहद को चूमा था
तिरंगा ही कफ़न हो आखरी अरमान पाले थे ।
अनिल उपहार
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