अतीत की पगडंडी पर
चलते चलते
खो जाता है मन
दिवास्वप्नों में ।
नेह की बारिश में
भीगता तनमन
अकल्पनीय बंधनो में
जकड़ना
मुठ्ठी में कसकर
पकड़ लेना
आशाओ की बालू
ठीक उसी तरह
जिस तरह तुमने बांधा था
अपने मोहपाश में ।
सुरमई धूप का खिलना
यादों के दरीचों का खुलना
कोई दस्तक तो नही है न ,,
तुम्हारे आगमन की ।
माटी की सौंधी गंध
बता रही है कि-
कोई भीग गया है फिर से
पहली बारिश में
और रख दिया है
सावन अपनी पलकों पर ।।।
अनिल जैन उपहार
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