हर बार फेंका गया यक्ष प्रश्नों का जाल पल पल प्रतिपल गहराता विषमताओं का समुद्र । रीत ता जाता , मानवीय मूल्यों का मीठा झरना । अतृप्त मन की प्यास खोज रही है अपने पन की दो चार बूंदे गुम होते रिश्तो के बीच ।
अनिल जैन उपहार
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