बदलते हुए हालात
और
ढलते हुए यौवन की
मानिंद
बेज़ार होती जीवन की
अंतहीन यात्रा
थकने भी तो नही देती ।
रोज़ भागती सांसे
तेज़ रफ़्तार से ,
तिरस्कार की
बोझिल होती पगडंडी
फिर भी उड़े जा रहा है
मन का पंछी
किसी आसमा की तलाश में ,
शायद जीवन जीने की
यही तो कला है ।।।।।।
अनिल जैन उपहार
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