Saturday, May 2, 2020

कविता

कोरोना सबसे बड़े गुरु निकले तुम ।
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माना कि इस कोरोना ने
ले ली कई जिंदगियां
धूल धूसरित कर दिए
कई सपनों को ।
पर ये एक ऐसा पाठ पढ़ा गया
शायद
 जिसकी
कल्पना भी तो नही की थी
किसी ने ।
इंसान समझ रहा था
कि ,ढाबों पर खाये बिना
नही मिट सकती भूख।
जंक फूड के बिना
नीरस है जिंदगी।
बेवजह सड़कों पर घूमना
देता है मज़ा असली जीवन को,
गहराता यह प्रदूषण
देता है गति विकास के पहिये को,
लेकिन तुमने सीखा दिया दुनियाँ
को
बिना इन सबके भी चलती है
ज़िंदगी।
घर मे रहकर
जीती जा सकती है सारी जंग।
मूर्ख बना यह इंसान
यदि समय रहते समझ जाता
तुम्हारी मोन भाषा
तो शायद ये दिन न देखने पड़ते।
मन्दिर बन्द,मस्ज़िद बन्द,
स्कूल बंद,दफ्तर बन्द
कहाँ रुका है जीवन
नही बदली तो बस
आदमी की ओछी मानसिकता।
जिसने बना दिया है गुलाम
बरसों से ।
हा अपनों के साथ रहने का
क्या होता है सुख
कैसे बदल जाता है सब कुछ
समझ गये है सब।
कितनी गज़ब की है
तुम्हारी यह पाठ शाला।
दरवाज़े खिड़कियों को
दे रहे है उलाहना,
कपड़े चिढ़ा रहे है
आलमारियों को ,
शायद यही है औकात
आदमी की ।

डॉ अनिल जैन उपहार

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