Thursday, September 12, 2024

हिंदी दिवस पर

उपमाओं ने गूंथा इसको बिंबों ने खूब संवारा।

कभी अलंकृत हुई धरा पर गीतों ने खूब निखारा।

पंथ निराला की बेटी बन तुलसी का मान बढ़ाया।

दिनकर के आंगन की शोभा भावों ने थाल सजाया।

माथे की बिंदी सी शोभित ये हिंदी कहलाती है।

मां की लोरी की मधुर तान सुन बचपन को दुलराती है ।

डा अनिल उपहार

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