पल पल प्रतिपल
तंग होती
संवेदना की चौखट ।
और विस्तार पाता
स्वार्थ का गहरा आयतन ,
ऊपर से अपनी मज़बूत जड़े पसारता
आभासी दुनियां का
मकड़ जाल ।
संचार क्रांति की भेंट चढ़ता
बचपन
कभी अपनों से बैठ कर
बतियालिया होता
बूढ़े माँ बाप की कुछ उम्र
बढ़ जाती ।
हम वही तो बो रहे है
जिसे काटना है
हमारे अपने अंश को
सौपने के लिए वही सब
जो हमने अपनो को
दिया है ।।।।।
अनिल उपहार
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