Thursday, June 21, 2018

बोझिल मन (कविता)

श्वांस दर श्वास
कम होती जिंदगी
पल पल बढ़ती
स्वार्थ परक रिश्तों में
राजनीति,
हर वक़्त किसी अनहोनी
के भय से दम तोड़ती
दोहरी ज़िम्मेदारी ।
आधुनिकता को ओढ़े
कलयुगी प्राण,
आखिर हम क्या पढ़ रहे है
समझ से परे होती
संस्कारों की पाठशाला
बेबस और लाचार मन
असहजता को छान रहा है
जिम्मेदारियों के बोझ तले ।

अनिल जैन उपहार

No comments:

Post a Comment