Sunday, May 19, 2019

महक(मुक्तक)

क़तरा-ए-अश्क़ बनके टपकता रहा हूँ मै ।

अंगार    की    मानिंद  दहकता रहा हूँ मै  ।

मेंहंदी से लिखा नाम हथेली पे जो उसने 

खुशबू  से  सारी रात  महकता रहा हूँ मैं।

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अनिल डॉ अनिल जैन उपहार

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