तहज़ीब की ग्रंथावली सी हो तुम।
संस्कारों का समृद्ध विद्यालय
पलता है तुम्हारे आँचल में।
कहने को तो आज तक
किसी विद्यालय का मुँह
देखा नहीं तुमने ।
फिर भी
कैसे पढ़ा देती हो तुम
जीवन की जटिल समस्याओं से
लड़ने का सबक।
शायद तुम्हारा माँ होना ही
सबूत है
कि कितना अभ्यास किया होगा
हर दर्द सहने का।
ओ माँ तुम्हे शत शत नमन।
डॉ अनिल जैन उपहार
संस्कारों का समृद्ध विद्यालय
पलता है तुम्हारे आँचल में।
कहने को तो आज तक
किसी विद्यालय का मुँह
देखा नहीं तुमने ।
फिर भी
कैसे पढ़ा देती हो तुम
जीवन की जटिल समस्याओं से
लड़ने का सबक।
शायद तुम्हारा माँ होना ही
सबूत है
कि कितना अभ्यास किया होगा
हर दर्द सहने का।
ओ माँ तुम्हे शत शत नमन।
डॉ अनिल जैन उपहार
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