काव्यांजलि
Saturday, August 8, 2020
मुक्तक
महक जाये धरा मन की मैं ऐसा इत्र लाया हूँ ।
अदब और संस्कारों से सजा वो चित्र लाया हूँ ।
डिगा सकते नही जिसको चलन भी दोगलाई के
रखे महफूज़ दिल में राज़ ऐसे मित्र लाया हूँ ।
अनिल उपहार
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