काव्यांजलि
Sunday, January 17, 2021
मन देहरी(मुक्तक)
अंतस की इस ऊहा पोह में कैसे दस्तक द्वार लगाऊँ ।
रूठ गयी अब मन की देहरी कैसे वंदनवार सजाऊँ ।
स्मृति के अलसाये पन्ने और व्याकरण भी गहरा है
शब्दकोष भी विवश बहुत है अब कैसे प्रतिमान जुटाउँ ।
-------डॉ-अनिल उपहार -----
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