सुलगते सवालों पर
उपहास का मरहम
उन्नत और व्याकुल
प्रश्नों के अर्थ खोते
समाधान के छितराए बादल
खोल देते है पीड़ा के बंद द्वार
हर बार छला जाता है मन।
आभासी दुनियां में गुम होती
अपने पन की निश्च्छल हँसी
भाने लगता है धुंधलका
और खो जाता है बरसों का
सहेजा हुआ प्यार।
अजीब रवायत है न
इस संसार की,
कब लौटेगा आदमी
अनजान सफर से
अपने बिखरते हुए
स्मृति के कच्चे मकान में।
डॉ अनिल जैन उपहार
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