Thursday, February 25, 2021

मुक्तक (फागुनी रंग)

भाव उदघोषित हो मन के नेह के निर्झर झरे।
तन बासन्ती फ़ाग गाए व्यंजना खुद रंग भरे।
देह निर्मित चंदनों से नित नए परिधान लौटे
गीत फिर अधरों पे आए मिलन की पुष्टि करे।

डॉ अनिल जैन उपहार

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