Tuesday, April 6, 2021

प्रतीक (कविता)

बातों ही बातों में अक्सर
तुम मुझमे खोने लगते हो।
बीच भंवर में अल्फाज़ो के
भ्रमर जाल बोने लगते हो।

अनुत्तरित से रहे सदा जो
वो सारे प्रश्नों के हल भी
समाधान की बाट जोहते
थक कर सोने चले गए है।

कौन घड़ी किस पल पर ठहरे
स्वप्न खुद ही से छले गए है।

अलसाये पन्नो के सच मे 
अश्रु जल धोने लगते हो।

डॉ अनिल जैन उपहार

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