Sunday, January 9, 2022

मुक्तक आशा और निराशा

चाहे ज़ख्म सहे होंगे, हर चोट नेह की भाषा है ।

तारे गिन गिन रात गुज़ारें ,जीवन की अभिलाषा है ।

दोराहे पर शब्द मौन है ,भोर खड़ी है द्वारे पर 

रात यही कहती है दिन से ,घोर निराशा में आशा है ।

###डॉ अनिल जैन उपहार

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