काव्यांजलि
Wednesday, January 18, 2023
मन देहरी (मुक्तक)
अंतस की इस ऊहा पोह में कैसे दस्तक द्वार लगाऊँ ।
रूठ गयी अब मन देहरीभी कैसे वंदनवार सजाऊँ ।
स्मृति के अलसाये पन्ने और व्याकरण भी गहरा है
शब्दकोष विवश लगता है अब कैसे प्रतिमान जुटाउँ ।
--------अनिल उपहार -----
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