गीत गुनगुना रहा हूँ गीत बन के आइये।
देहरी पे फिर कोई नवगीत छेड़ जाइये।
मुक्तकों से है नयन छंद सजे अधरों पर।
गेसुओं पे सज रही घनाक्षरी भी झूम कर।
लक्षणा अभिधा जैसा रूप ओढ़ आइये
व्यंजना से स्वर मिले वो काफिया सजाइये।
गुरु लघु सा चित्र लिए रेखाए बता रही।
लय और ताल सी गति ह्रदय पटल पे छा रही।
दोहों और चौपाइयां सी तान लेके आइये।
पायलों की वो मधुर झनकार ले के आइये।
आभा स्वर्ण रश्मियों ने जो रखी कपोल पर।
गीतिका सी लग रही दो पाँखुरी अधर पर।
भोएँ अनुबंध लिख रही थी स्वप्न आइये।
नयनों के अनुप्रास पर गीत तो रचाईये ।
डॉ अनिल जैन उपहार #कॉपीराइट
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