काव्यांजलि
Saturday, December 16, 2023
मुक्तक(रूपसी)
दर्पण में क्या संवारा की दर्पण संवर गया।
अश्कों की झील में उतर अश्रु संवर गया।
वो धूप रूप की बदन को धन्य कर गई,
उतरी धरा पे धूप तो मौसम संवर गया।
डा अनिल जैन उपहार
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