Sunday, April 14, 2024

मुक्तक (अंतर)

तुम इंतज़ार से रहे सदा,मैं नेह दीप की बाती सा।

तुम स्मृति के शिलालेख से,मैं धुंधली सी पाती सा।

कुछ जटिल प्रश्न थे  हल हो कैसे लगे रहे इस उलझन में,

तुम भौतिकता की चकाचौंध,मैं पुरातन परिपाटी सा।

डा अनिल जैन उपहार

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