Saturday, April 27, 2024

संवाद हीनता(मुक्तक)

संवाद हीनता बढ़ती जाती रिश्ते रोज़ दरकते है।

संबंधों के कैनवास पर पथराए नयन तरसते है।

खामोशी को ओढ़ अधर सहमे सहमे रहते है,

अवसादों के घने से बादल आंगन रोज बरसते है।

डा अनिल जैन उपहार

No comments:

Post a Comment