तुम चाहते थे
प्रकाश की मानिंद
आधुनिकता को ओढ़ लेना ।
और मैं
परम्परा को धरती की तरह
बिछाता रहा ।
चुभने लगी
घोर अभावों की सुइयां
संबंधो के गुलमोहर
रोज़ खिलते थे
आश्वासनों के गमलो में ।
कोई किरदार फिर हो उठता
जीवंत
समेटने लगता निश्चलता के
बिखरे पन्नों को ।
और उम्मीदों की चौखट ,
गहरी संवेदना को
पढ़ती रहती
प्राक्कथन की तरह ।
अनिल उपहार
No comments:
Post a Comment