Wednesday, July 4, 2018

कलमकार(कविता)

उदासी की किश्तों में
बन्द
ज़ार ज़ार होती दलीलें
किसी बेकसूर आदमी
के हलफनामे की
धुंधली सियाही की तरह
बांच नही पाता मन,
खामोशी के केनवास पर
भर देना चाहता है
न जाने कितने चटख रंग,
कौन है जो बदल देता है
कूँची हर बार,
कलमकार के व्याकुल हृदय की
मौन भाषा
क्या गहरे संवाद तो नही
करना चाहती ?
कैसे लिखदें कोई
गवाही
और सुनादे फिर अनहोना सा
फैसला ।

# कॉपीराइट अनिल जैन उपहार

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