बारिश में नहाया
पूरा शहर
घोर उदासी का
आवरण ओढ़े,
बाट जोहती
अलसायी देहरी ,
खिलता हुआ अमलतास
जैसे चिढ़ाने को हो आतुर
हर बार उलाहनों के
विस्तार पाते दायरे,
शिकायतों की
मोटी होती फ़ेहरिस्त
और उस पर
मौसम का कहर,
बांध लिये है घुँघरू
संवेदनाओ ने
अनागत की प्रतीक्षा में ।
अनिल जैन उपहार
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