Thursday, July 26, 2018

इस बारिश(कविता)

इस बारिश कुछ इस तरह
भीगा जाये
कुछ उलाहनों की नदियां हो
शिकायतों की तलैया हो
और हम अपनो के साये में
बेखोफ कूद जाये
रिश्तो के सागर में ।
जहाँ नेह के अदभुत
झरने थाम ले

बेइंतहा प्रतीक्षा की
घड़ियों को ।
देहरी खोल दे बन्द द्वार
दमक उठे कल्पना के
सतरंगी इंद्रधनुष
आओ मिलकर भरदे
इनमें कुछ रंग ।।।

अनिल जैन उपहार

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